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₹1400 करोड़ का कोयला विवाद: अडानी के खिलाफ फैसला और उसी दिन जज का तबादला

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अडानी-लिंक्ड कंपनी ने सरकार से ₹1,400 करोड़ वसूला; फैसले के SAME DAY जज का तबादला — वायरल दावा, सत्य और सिस्टम का सच


राजस्थान के एक जिला न्यायालय ने जुलाई 2025 में एक अहम फैसला सुनाया, जिसमें उसने पाया कि अडानी-लिंक्ड कोयला खनन कंपनी ने सरकार के खिलाफ अनुबंध नियमों का उल्लंघन करते हुए ₹1,400 करोड़ से ज़्यादा कोयले के परिवहन शुल्क के रूप में वसूला था। 2

इस मामले में अनुबंध के मुताबिक़ कंपनी को खदान से सबसे नज़दीकी रेलवे लाइन तक कोयले के परिवहन की जिम्मेदारी थी, लेकिन उसने वह रेलवे लाइन नहीं बनाई। इसके बजाय ट्रकों से कोयला रेलवे स्टेशन तक पहुँचाया गया और उस ट्रक परिवहन का खर्च राज्य की सरकारी कंपनी से लिया गया, जो कुल ₹1,400 करोड़ से अधिक निकला। 3

कोर्ट ने इसे “wrongful gains” यानी अनुचित लाभ के रूप में देखा और कंपनी पर ₹50 लाख का जुर्माना लगाया, साथ ही राज्य सरकार से Comptroller and Auditor General (CAG) जांच कराने को कहा। हालांकि यह आदेश बाद में हाई कोर्ट ने स्टे कर दिया। 4


🔥 वायरल दावा क्या है?

सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि—

“जज ने अडानी के खिलाफ फैसला दिया, इसलिए BJP सरकार ने जज को पद से हटा दिया।”

✅ फैक्ट-चेक: सरकार ने जज को पद से नहीं हटाया

Times Watch देश दुनिया की पड़ताल में यह स्पष्ट है कि—

  • ❌ जज को “पद से हटाया” नहीं गया
  • ❌ सरकार के पास ऐसा संवैधानिक अधिकार नहीं है
  • ✔️ जज को उसी दिन तबादला किया गया

यानी वायरल वीडियो कानूनी भाषा में भ्रामक है, लेकिन सवाल सिस्टम और प्रशासनिक निर्णयों पर गंभीर रूप से उठता है।




✍️ रिज़वान की कलम से

यह सच है कि सरकार ने जज को संविधान के तहत नहीं हटाया। लेकिन यह भी सच है कि अगर सिस्टम चाहे, तो ऐसे फैसले देने वाले जज को वहीं टिकने देना बहुत मुश्किल होता है।

कोयला परिवहन मामले में ₹1,400 करोड़ से ज्यादा वसूली की बात सामने आई, और जज ने उस पर **सख़्त फैसला** दिया — यह वही फैसला था जिसने अनुबंध की ख़ामियों पर सवाल उठाए। 5

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भारत में आज जब कोई भी बड़ी शक्ति, चाहे वह सरकार हो या कॉरपोरेट समूह, बढ़ते प्रभाव के साथ जुड़ती है, तो सिस्टम अपने ढंग से प्रतिक्रिया करता है — और वही सिस्टम कभी-कभी जज की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है।


🔚 निचोड़

यह मामला सिर्फ़ एक फैसला नहीं था — यह सवाल है कि जब किसी शक्ति का हित राष्ट्रीय राजनीति और बड़े कॉन्ट्रैक्ट्स से जुड़ जाए, तो न्यायपालिका कैसे अपनी स्वतंत्रता बनाये रखती है।

आज सवाल यही है — क्या अडानी के खिलाफ फैसला देने वाले जज को मजबूरन हटाया जाएगा?

यही लोकतंत्र की असली परीक्षा है।

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