छत्तीसगढ़ के कांकेर में चर्चों पर हमला: दफन विवाद के बाद आगजनी, पत्थरबाज़ी; ASP समेत करीब 20 पुलिसकर्मी घायल
छत्तीसगढ़ के कांकेर ज़िले के एक गांव में दफन (Burial) को लेकर उठा विवाद हिंसा में बदल गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक दो चर्च में आगजनी हुई, एक प्रार्थना हॉल को भी नुकसान पहुंचा, और पत्थरबाज़ी में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ASP) समेत करीब 20 पुलिसकर्मी घायल हुए। एक ईसाई परिवार के घर को भी आग लगाए जाने की बात सामने आई है।
क्या हुआ था?
- घटना कांकेर ज़िले के अंबाबेड़ा (Amabeda) क्षेत्र के एक गांव/पंचायत (रिपोर्ट्स में बड़े तेवड़ा/Badetevda का ज़िक्र) से जुड़ी बताई गई है। 0
- विवाद की जड़: एक परिवार द्वारा निजी ज़मीन पर दफन किए जाने के बाद कुछ ग्रामीणों ने आपत्ति जताई—दावा किया गया कि यह आदिवासी/स्थानीय परंपराओं के मुताबिक नहीं हुआ। 1
- प्रशासन के अनुसार शिकायत पर कार्यपालिक मजिस्ट्रेट ने शव निकालने (Exhumation) का आदेश दिया और फिर पोस्टमॉर्टम व जांच की बात कही गई। 2
- इसके बाद माहौल और बिगड़ा—पत्थरबाज़ी, झड़प, और पुलिस को लाठीचार्ज तक करना पड़ा। रिपोर्ट्स के मुताबिक करीब 20 पुलिसकर्मी घायल हुए, जिनमें ASP (अंतागढ़) भी शामिल बताए गए। 3
- द वायर की रिपोर्ट में पीड़ित पक्ष/स्थानीय सूत्रों के हवाले से कहा गया कि चर्च, प्रार्थना हॉल और एक ईसाई परिवार के घर को निशाना बनाया गया; वहीं पुलिस ने FIR दर्ज होने की जानकारी दी। 4
नोट (Reel/Upload Date): आपकी स्क्रीनशॉट में तारीख 22 Dec, 2025 दिख रही है। लेकिन जिन मुख्य रिपोर्ट्स पर भरोसा किया जा सकता है, उनमें अपडेट 19 Dec 2025 और लेख लाइव 20 Dec 2025 बताया गया है। इसलिए संभव है कि 22 Dec “अपलोड/रील” की तारीख हो—घटना की नहीं। 5
प्रशासन/पुलिस ने क्या कहा?
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक पुलिस ने कहा कि शिकायत के आधार पर शव निकालने की प्रक्रिया और कानूनी कार्रवाई की जाएगी, और झड़प में संपत्ति नुकसान भी हुआ। साथ ही, प्रशासन-पुलिस अफसरों की मौजूदगी में स्थिति नियंत्रित करने की बात
पीड़ित पक्ष/समुदाय का दावा
छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फोरम के हवाले से TNIE में कहा गया कि दो चर्च जलाए गए और कुछ ईसाई परिवारों के घरों पर हमला हुआ। वहीं द वायर में पीड़ित/स्थानीय पक्ष ने आरोप लगाए कि भीड़ के उग्र होने पर रोक लगाने में प्रशासन देर से हरकत में आया। (ये आरोप हैं—इन्हें आधिकारिक जांच/चार्जशीट के निष्कर्ष से ही अंतिम माना जा सकता है।) 7
रिज़वान की कलम
एक समाज का असली इम्तिहान उसके कब्रिस्तान और श्मशान के फैसलों में होता है—कि वो अपने मरे हुए को भी चैन से दफन करने देगा या नहीं। और जब किसी इंसान की आख़िरी रस्म भी “भीड़ की मंज़ूरी” पर टिक जाए, तब समझिए कि कानून पीछे हट रहा है और डर आगे बढ़ रहा है।
इस मामले में सबसे डराने वाली बात सिर्फ आगजनी या पत्थरबाज़ी नहीं—बल्कि यह है कि विवाद चाहे “परंपरा” के नाम पर शुरू हुआ हो, उसका नतीजा अल्पसंख्यक की पहचान, उसके इबादत-स्थल और उसके घर तक जा पहुंचा। और फिर “स्थिति नियंत्रण में है” कहकर कहानी को वहीं रोक देना आसान हो जाता है।
सवाल सीधा है: अगर 20 पुलिसकर्मी घायल हो सकते हैं, तो आम नागरिक कितना असुरक्षित होगा? और अगर भीड़ के सामने धार्मिक स्वतंत्रता और अंतिम संस्कार जैसे बुनियादी हक भी डगमगाएं—तो यह सिर्फ एक गांव की खबर नहीं, यह एक देश का चेतावनी-सिग्नल है।
- The New Indian Express (19 Dec 2025): “Churches set ablaze as burial dispute sparks violence in Chhattisgarh village” 8
- The Wire (20 Dec 2025): “Mob torches Christian home, churches over burial dispute…”
कांकेर में दफन विवाद ने हिंसक रूप लिया—रिपोर्ट्स के मुताबिक चर्चों में आगजनी और पत्थरबाज़ी में कई लोग घायल हुए।

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