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उन्नाव की बेटी फिर सवाल बनकर खड़ी है — क्या इस देश में ताक़तवरों के लिए अलग और पीड़ितों के लिए अलग न्याय है?

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उन्नाव रेप केस: सज़ा सस्पेंड होते ही सवालों के घेरे में न्याय — सत्ता की ढाल या कानून की लाठी?

उन्नाव रेप केस में पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की सज़ा सस्पेंड होने के बाद न्याय व्यवस्था और राजनीतिक संरक्षण पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

रिज़वान की कलम से

कुछ फैसले सिर्फ अदालत की फाइलों में नहीं रहते — वे समाज के ज़मीर पर सवाल बनकर उतरते हैं। उन्नाव रेप केस में दोषी ठहराए जा चुके पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद की सज़ा का सस्पेंड होना, ऐसा ही एक फैसला है।

यह वही केस है जहाँ एक नाबालिग बेटी न्याय की गुहार लगाती रही, उसका पिता रहस्यमयी हालात में जेल में मरा, पीड़िता पर जानलेवा हमला हुआ, और फिर भी सिस्टम लंबे समय तक खामोश बना रहा।

अब जब अदालत ने कानूनी प्रक्रिया के तहत सज़ा सस्पेंड की है, तो कानूनन यह फैसला वैध हो सकता है — मगर नैतिक रूप से यह समाज के सामने एक डरावना सवाल छोड़ जाता है:

क्या भारत में न्याय वही है, जो ताक़तवरों के लिए अलग और कमज़ोरों के लिए अलग होता है?

यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं है, यह उस ढांचे की कहानी है जहाँ राजनीतिक संरक्षण अक्सर कानून से तेज़ दौड़ता है।

उन्नाव की बेटी को न्याय पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक दौड़ना पड़ा, मीडिया के सामने आना पड़ा, और अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ी। सवाल ये नहीं कि अदालत ने क्या कहा — सवाल ये है कि अगर ये लड़की आम, अनसुनी और बेआवाज़ होती तो क्या उसे कभी न्याय मिलता?



यह फैसला हमें याद दिलाता है कि आज भी इस देश में सत्ता + अपराध + संरक्षण का गठजोड़ जिंदा है — और यही गठजोड़ कानून की लाठी को अक्सर कमज़ोर कर देता है।

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उन्नाव की बेटी आज भी एक सवाल बनकर खड़ी है — और उसका सवाल सिर्फ सरकार से नहीं, हम सब से है:

क्या हमारा लोकतंत्र पीड़ित के साथ खड़ा है, या ताक़तवर के?

जब तक इस सवाल का जवाब ईमानदारी से नहीं मिलेगा, तब तक सेंगर बदलेंगे — कहानी नहीं बदलेगी।


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