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दिनांक: {06/01/2026}
एडिशन: Evening
🔴 नफ़रत का खुला एलान, सत्ता की गूंगी सहमति
मुसलमानों को “भूखा मारने” की अपील और ‘सबका साथ’ का मौन तमाशा
भारत के सार्वजनिक जीवन में नफ़रत अब फुसफुसाहट नहीं रही, मंचों से माइक पकड़कर खुलेआम एलान बन चुकी है। सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में Pravin Togadia मुसलमानों के ख़िलाफ़ आर्थिक बहिष्कार की खुली अपील करते दिखते हैं—
फल-सब्ज़ी न बेचने की बात,
दूध न देने की बात,
काम-धंधा बंद कराने की बात—
यानी सीधा संदेश: “भूखा मार दो।”
यह कोई आवेश में निकला शब्द नहीं, बल्कि संगठित नफ़रत की रणनीति का सार्वजनिक खाका है।
⚠️ यह सिर्फ़ बयान नहीं, एक ख़तरनाक आह्वान है
किसी समुदाय को खाने-पीने, रोज़गार और जीवन के साधनों से वंचित करने की अपील—
👉 यह घृणा भाषण है
👉 यह संवैधानिक मूल्यों पर हमला है
👉 और यह सामाजिक हिंसा को न्योता है
भारत का संविधान नागरिकों को धर्म के आधार पर भेदभाव से सुरक्षा देता है। लेकिन ज़मीन पर तस्वीर उलटी है—नफ़रत को न तो रोकने की इच्छा दिखती है, न सज़ा का डर।
🤐 ‘सबका साथ, सबका विकास’—और सत्ता की खामोशी
देश का प्रधानमंत्री मंचों से “सबका साथ, सबका विकास” का नारा देता है,
लेकिन जब
- मुसलमानों के ख़िलाफ़ बहिष्कार की अपील होती है,
- नफ़रत भरे भाषण खुलेआम घूमते हैं,
- और समाज को बाँटने की कोशिशें तेज़ होती हैं—
तो वही सत्ता मौन साध लेती है।
यह चुप्पी सिर्फ़ चुप्पी नहीं है,
यह राजनीतिक सहमति का संकेत बन जाती है।
🧨 नफ़रत क्यों बेलगाम है?
क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में एक पैटर्न बना है:
- नफ़रत फैलाओ →
- भीड़ को उकसाओ →
- अल्पसंख्यकों को निशाना बनाओ →
- और सत्ता देखती रहे
नतीजा?
नफ़रत बोलने वालों को सज़ा नहीं, हौसला मिलता है।
उन्हें लगता है—“बोलो, कोई पूछने वाला नहीं।”
🧠 आर्थिक बहिष्कार: हिंसा का ‘सभ्य’ चेहरा
इतिहास गवाह है—
दंगे सिर्फ़ लाठियों से नहीं होते,
रोटी छीनकर भी होते हैं।
जब आप किसी समुदाय से कहते हैं—
“तुम्हें न काम मिलेगा,
न सामान बिकेगा,
न खरीदने दिया जाएगा”
तो यह धीमी मौत का नुस्खा होता है।
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❓ कानून कहां है? प्रशासन कहां है?
सवाल सिर्फ़ यह नहीं कि Pravin Togadia क्या बोल रहे हैं,
सवाल यह है कि—
- पुलिस ने क्या संज्ञान लिया?
- प्रशासन ने क्या कार्रवाई की?
- सरकार ने क्या संदेश दिया?
या फिर यह मान लिया जाए कि
नफ़रत अब ‘नया नॉर्मल’ है?
✊ Times Watch का सवाल
अगर आज एक समुदाय को भूखा मारने की बात कही जा सकती है,
तो कल किसी और की बारी होगी।
नफ़रत जब राज्य की चुप्पी पाती है,
तो वह ताक़त बन जाती है।
और तब
“सबका साथ, सबका विकास”
सिर्फ़ चुनावी जुमला बनकर रह जाता है


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