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जब विरोध मुसलमानों का था, तब गोली के नारे थे — आज वही लोग UGC बिल पर तिलमिलाए
विशेष टिप्पणी | Rizwan ki Kalam
देश ने हाल के वर्षों में चुनिंदा राष्ट्रवाद का जो चेहरा देखा है, वह लोकतंत्र की बुनियादी आत्मा पर सीधा प्रहार करता है। CAA–NRC के ख़िलाफ़ जब मुसलमान सड़कों पर उतरे, तब असहमति को देशद्रोह करार दिया गया। दिल्ली की सड़कों पर “देश के गद्दारों को गोली मारो” जैसे नारे लगे, और शांतिपूर्ण प्रदर्शन को लाठियों से कुचलने की कोशिश हुई।
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| विरोध किसका है—यही तय करता है देशभक्ति? |
तब संविधान, अभिव्यक्ति की आज़ादी और विरोध का अधिकार किसी को याद नहीं आया। तब कहा गया—सरकार के ख़िलाफ़ बोलना देश के ख़िलाफ़ है।
लेकिन आज, जैसे ही UGC बिल सामने आया, वही तबका—जो कल तक हर सरकारी फ़ैसले पर ताली बजाता था—अचानक बौखला उठा। प्रतिक्रिया ऐसी मानो केंचुओं के झुंड पर नमक डाल दिया गया हो। सवाल उठने लगे, आशंकाएँ जताई जाने लगीं, और विरोध के सुर तेज़ हो गए।
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दोहरा मापदंड: विरोध किसका है, इससे तय होता है देशभक्ति
यहाँ सवाल UGC बिल का समर्थन या विरोध नहीं है। सवाल यह है कि विरोध का अधिकार आखिर किसे है? अगर CAA–NRC पर सवाल उठाना ग़द्दारी था, तो आज UGC बिल पर सवाल उठाना क्या कहलाएगा?
या फिर संविधान सिर्फ़ तब तक पवित्र है, जब तक वह “हमारे” पक्ष में खड़ा हो?
लोकतंत्र में असहमति अपराध नहीं
लोकतंत्र का मतलब केवल चुनाव नहीं होता, बल्कि असहमति की आज़ादी भी होता है। जब राज्य शक्ति का इस्तेमाल करके किसी समुदाय के विरोध को दबाया जाता है और दूसरे समुदाय के आक्रोश को वैध ठहराया जाता है, तो यह न्याय नहीं, पक्षपात कहलाता है।
देश की सड़कों पर गोली के नारे लगाने वालों ने कल संविधान को रौंदा था; आज वही लोग संविधान की दुहाई दे रहे हैं। यही नक़ली राष्ट्रवाद की पहचान है—जो सत्ता के साथ बदलता रहता है।
निष्कर्ष
आज ज़रूरत इस बात की है कि हम चुनिंदा आक्रोश और दोहरी देशभक्ति को पहचानें। विरोध चाहे मुसलमानों का हो या छात्रों–शिक्षकों का—संविधान सबको बराबर अधिकार देता है। जो कल चुप थे, उन्हें आज बोलने से पहले अपने कल का हिसाब देना होगा✍️

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