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नीतीश कुमार ने खींचा मुस्लिम महिला का हिजाब: यह सिर्फ़ एक हरकत नहीं, सत्ता की सोच का आईना है
जब किसी लोकतांत्रिक देश का मुख्यमंत्री सार्वजनिक मंच पर एक मुस्लिम महिला का हिजाब खींचता है, तो वह सिर्फ़ कपड़े को नहीं छूता — वह सम्मान, पहचान और संवैधानिक मर्यादा को भी हाथ लगाता है।
यह कोई “छोटी सी घटना” नहीं है। यह कोई “गलतफहमी” नहीं है। और न ही इसे किसी कारण, बहाने या सफ़ाई की ज़रूरत है।
हिजाब किसी बहस का विषय नहीं, हिजाब किसी की अनुमति से पहना जाने वाला परिधान नहीं, और हिजाब किसी मुख्यमंत्री की जिज्ञासा या मज़ाक का हिस्सा भी नहीं।
❝ गोदी मीडिया का खेल: हर अपराध के लिए एक बहाना ❞
गोदी मीडिया तुरंत मैदान में उतर आती है — कैमरे, पैनल, चीखते एंकर… और फिर शुरू होता है “कारण ढूंढने” का खेल।
• क्यों खींचा? • किस इरादे से खींचा? • असल में तो वो ऐसा नहीं चाहते थे…
लेकिन सवाल यह नहीं है कि क्यों खींचा। सवाल यह है कि खींचने की हिम्मत आई कहाँ से?
❝ अगर यही हरकत किसी और समुदाय की महिला के साथ होती? ❞
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ज़रा कल्पना कीजिए — अगर किसी मुख्यमंत्री ने किसी हिंदू महिला की साड़ी का पल्लू, या किसी सिख महिला की चुन्नी सार्वजनिक मंच पर खींच दी होती…
देश जल उठा होता। इस्तीफ़े की मांग होती। राष्ट्रीय बहस छिड़ जाती।
लेकिन जब बात आती है मुस्लिम महिला की — तो सब कुछ “नॉर्मल” बना दिया जाता है।
❝ यह हिजाब नहीं, यह संदेश है ❞
यह घटना एक साफ़ संदेश देती है —
- मुस्लिम शरीर पर सत्ता का अधिकार समझा जा रहा है
- मुस्लिम महिला की निजता कोई मायने नहीं रखती
- सम्मान अब बहुसंख्यक पहचान से तय होगा
आज हिजाब खींचा गया है। कल ज़ुबान खींची जाएगी। परसों पहचान।
❝ खामोशी भी अपराध है ❞
सबसे डरावनी चीज़ यह नहीं कि यह हुआ — सबसे डरावनी चीज़ यह है कि सिस्टम चुप है, सत्ता मुस्कुरा रही है, और मीडिया सफ़ाई में जुटा है।
जब सत्ता सवालों से डरना छोड़ दे और अल्पसंख्यक अपमान से — तब लोकतंत्र सिर्फ़ नाम का रह जाता है।
— रिज़वान की क़लम से
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