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“‘पाकिस्तानी डकैत’ का बहाना और धुरंधर की हक़ीक़त: पाकिस्तान के नाम पर इस्लामोफोबिया का खेल”

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“पाकिस्तानी डकैत” सिर्फ़ बहाना है, असली निशाना मुसलमान हैं

— रिज़वान की क़लम से

आज के भारत में एक अजीब और डरावना सच आकार ले चुका है। यहाँ पाकिस्तान का नाम लेना अपराध नहीं, लेकिन इस्लामोफोबिया पर सवाल उठाना गुनाह बना दिया गया है

सरकारी मीडिया हो या सिनेमा, हर जगह एक ही पैटर्न दिखता है— पाकिस्तान को घसीटो, डर पैदा करो, और उस डर की आड़ में भारतीय मुसलमान के खिलाफ़ नफ़रत का नैरेटिव गढ़ दो

DD News द्वारा फ़िल्म धुरंधर से जुड़ा मामला इसका ताज़ा उदाहरण है। कुछ लोगों की प्रतिक्रिया दिखाई गई और उसे “पाकिस्तान की प्रतिक्रिया” बताकर चला दिया गया। बाद में सामने आया कि वे लोग भारत के ही नागरिक थे

धुरंधर सिर्फ एक मूवी या इस्लामोफोबिया?


यह कोई मामूली भूल नहीं थी। यह उस मानसिकता की उपज है जहाँ “पाकिस्तान” एक ट्रिगर शब्द बन चुका है— जिसे उछालते ही दिमाग़ बंद और नफ़रत चालू हो जाती है।


“पाकिस्तानी डकैत” की स्क्रिप्ट

“पाकिस्तानी डकैत”— ये शब्द अपने आप में एक पूरी स्क्रिप्ट है।

इस स्क्रिप्ट में न सबूत ज़रूरी हैं, न क़ानून, न इंसाफ़।

बस इतना काफ़ी है कि नाम में “पाकिस्तान” जोड़ दो, और शक अपने आप मुसलमान पर चला जाएगा।

असल में यह कहानी डकैत की नहीं, डर की राजनीति की है।


धुरंधर: फ़िल्म नहीं, नफ़रत का प्रोजेक्ट

फ़िल्म धुरंधर को अगर सिर्फ़ मनोरंजन मान लिया जाए, तो यह एक बड़ी भूल होगी।

यह उस सिनेमा का हिस्सा है जहाँ—

  • मुसलमान = संदिग्ध
  • मुसलमान = हिंसक
  • मुसलमान = देश का दुश्मन

और इस सबको राष्ट्रवाद के कवर में बेचा जाता है।

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सबसे खतरनाक बात यह है कि इस पर न सरकार को बुरा लगता है, न सेंसर बोर्ड को, न सरकारी मीडिया को।


क्यों किसी को बुरा नहीं लगता?

अगर किसी फ़िल्म में किसी और समुदाय को ऐसे ही राक्षसी रूप में दिखाया जाता, तो देश हिल जाता।

मगर जब निशाने पर मुसलमान होते हैं, तो अचानक सबको अभिव्यक्ति की आज़ादी याद आ जाती है।

क्योंकि यह नफ़रत राजनीतिक फायदे का सौदा है।


पाकिस्तान सिर्फ़ बहाना है

सच यही है— न पाकिस्तान असली मुद्दा है, न कोई डकैत।

असल मुद्दा है भारतीय मुसलमान को “हम” से बाहर धकेलना

उसे बार-बार यह महसूस कराना कि वह इस देश में संदिग्ध है, अस्थायी है, और शक के घेरे में है।

यही वह ज़हर है जो मीडिया, फ़िल्मों और सत्ता के गठजोड़ से धीरे-धीरे समाज में घोला जा रहा है।


सबसे डरावनी सच्चाई

सबसे डरावनी बात यह नहीं कि नफ़रत फैलाई जा रही है।

सबसे डरावनी बात यह है कि इसे सामान्य बना दिया गया है।

टीवी पर, सिनेमा में, ख़बरों में।

और जो इस पर सवाल उठाए, वही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।


आज के भारत की कड़वी सच्चाई यही है—

पाकिस्तान का नाम लेना सुरक्षित है, लेकिन इस्लामोफोबिया पर सवाल उठाना ख़तरनाक।

नफ़रत बेचना देशभक्ति है, और इंसानियत की बात करना शक के दायरे में।

और धुरंधर जैसी फ़िल्में इसी माहौल की उपज हैं।

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