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चर्च में पवित्र मरियम और ईसा का अपमान | “बिना बाप के कैसे पैदा हुए?” | धार्मिक नफ़रत पर क़ानून ख़ामोश

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चर्च में पवित्र मरियम और हज़रत ईसा का अपमान: आस्था पर हमला, तर्क का ढोंग और क़ानून की ख़ामोशी

“ईसा बिना बाप के कैसे पैदा हो सकते हैं?” — चर्च के अंदर पूछा गया यह सवाल नहीं, एक सोची-समझी बेहुरमती है

हाल ही में सामने आए एक वीडियो में जो दृश्य दिखता है, वह सिर्फ़ बदतमीज़ी नहीं — ईसाई आस्था के मूल विश्वासों पर खुला हमला है।

चर्च के अंदर घुसकर एक व्यक्ति पवित्र मरियम अलैहिस्सलाम और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में भद्दी और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करता है।

वह यह कहते हुए “लॉजिक” मांगता है कि — “ईसा बिना बाप के कैसे पैदा हो सकते हैं?” और इस सवाल को आस्था पर तंज की तरह उछालता है।

लेकिन सवाल यह है — क्या तर्क सिर्फ़ दूसरों के धर्म के लिए होता है?

जिस समाज में यह कहा जाता है कि:

  • हनुमान सूरज को निगल गए
  • धरती सुअर के सींग पर टिकी है
  • सीता मटके से प्रकट हुईं

— वहाँ किसी और के धार्मिक विश्वास पर “लॉजिक” के नाम पर हमला करना पाखंड नहीं तो क्या है?

चर्च के अंदर एक व्यक्ति द्वारा पवित्र मरियम के खिलाफ अपमानजनक बयान और ननों को धमकी देते हुए दृश्य
चर्च के अंदर खुलेआम पवित्र मरियम के खिलाफ अपमानजनक भाषा और ननों–पादरियों को धमकी देता एक व्यक्ति। यह घटना धार्मिक स्वतंत्रता और क़ानून की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।


अगर सर्वशक्तिमान ईश्वर वीर्य से इंसान पैदा कर सकता है, तो क्या वह वीर्य के बिना जीवन पैदा नहीं कर सकता?

यही तो ईमानदारी का सवाल है — आस्था को समझने का, न कि उसे नीचा दिखाने का।

लेकिन वीडियो में दिखने वाला व्यक्ति न समझना चाहता है, न सम्मान देना। वह चर्च के अंदर खड़े होकर धमकी देता है, नारे थोपता है और आस्था का अपमान करता है।

यह न बहस है, न विचार — यह धार्मिक उत्पीड़न है।

और इससे भी बड़ा सवाल यह है कि — क़ानून चुप क्यों है?

अगर यही शब्द, यही लहजा, यही बेहुरमती किसी मंदिर में होती — तो क्या प्रशासन इतनी ख़ामोशी दिखाता?

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यही वजह है कि आज देश में यह धारणा मज़बूत हो रही है कि क़ानून सबके लिए बराबर नहीं रहा

भारत किसी एक धार्मिक कथा से नहीं, किसी एक नारे से नहीं — बल्कि संविधान और आपसी सम्मान से चलता है।

चर्च में पवित्र मरियम और हज़रत ईसा का अपमान सिर्फ़ ईसाइयों का अपमान नहीं — यह भारत की बहुलतावादी आत्मा पर हमला है।

सवाल उस व्यक्ति से नहीं, सवाल उस व्यवस्था से है जो ऐसे लोगों को बेख़ौफ़ छोड़ देती है।

— रिज़वान की क़लम से

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