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नफरत की शर्तें: क्या भाजपा में एंट्री के लिए मुसलमानों से नफरत ज़रूरी है?
✍️ रिज़वान की कलम से
ये सिर्फ़ एक बयान का मामला नहीं है। ये उस सोच का मामला है, जो आज की राजनीति में नॉर्मल बना दी गई है।
पूरा मामला क्या है?
हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक सार्वजनिक कार्यक्रम में पहुंचे। इसी दौरान एक महिला डॉक्टर उनसे मिलने आईं। डॉक्टर ने हिजाब पहन रखा था।
कार्यक्रम के दौरान कैमरों के सामने मुख्यमंत्री द्वारा उस महिला डॉक्टर का हिजाब खींचे जाने की तस्वीरें और वीडियो सामने आए।
यह दृश्य सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और इसे महिला सम्मान और धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़कर देखा गया।
मामला अभी शांत भी नहीं हुआ था कि झारखंड से भाजपा नेता सीपी सिंह ने एक ऐसा बयान दे दिया जिसने विवाद को खतरनाक मोड़ पर पहुंचा दिया।
सीपी सिंह ने सार्वजनिक तौर पर कहा —
“मुझे तो ऐसा लगता है कि कहीं इस महिला डॉक्टर का दिल्ली में लाल किले के पास हुए बम ब्लास्ट से कोई कनेक्शन तो नहीं है।”
यानि—
- कोई जांच नहीं
- कोई सबूत नहीं
- कोई एफआईआर नहीं
फिर भी एक महिला डॉक्टर को सीधे आतंकी हमले के शक से जोड़ दिया गया।
सवाल सिर्फ बयान का नहीं है
सवाल ये नहीं है कि सीपी सिंह ने क्या कहा। सवाल ये है कि ऐसा कहने का हौसला आया कहां से?
क्या अब भारत में—
- हिजाब पहनना शक की वजह है?
- मुसलमान होना शक की वजह है?
- औरत होना और सवाल करना अपराध है?
क्या भाजपा की राजनीति में मुसलमानों को शक के घेरे में डालना एक तयशुदा फार्मूला बन चुका है?
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या फिर ये मान लिया गया है कि नफरती बयान = राजनीतिक पहचान।
खामोशी भी सियासत होती है
सबसे चिंताजनक बात ये है कि—
- न पार्टी ने बयान से दूरी बनाई
- न किसी कार्रवाई की बात हुई
- न कोई नैतिक सवाल उठाया गया
ये खामोशी बताती है कि या तो सब सहमत हैं, या फिर नफरत अब स्वीकार्य राजनीति बन चुकी है।
ये देश नफरत से नहीं, संविधान से चलता है।
और जो राजनीति किसी एक मज़हब को दुश्मन बनाकर खड़ी होती है— वो आख़िरकार लोकतंत्र को भी कमजोर करती है।

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