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गंगा में मांसाहारी खाना फेंकने पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की बड़ी टिप्पणी; आरोपियों को मिली जमानत

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📍 स्थान: प्रयागराज / वाराणसी 📅 दिनांक: 17 मई, 2026

गंगा में मांसाहारी भोजन फेंकने पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, जानिए क्या है पूरा मामला

प्रयागराज: उत्तर प्रदेश के वाराणसी में गंगा नदी के बीच नाव पर इफ्तार पार्टी करने और नदी में मांसाहारी भोजन का कचरा फेंकने के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पवित्र गंगा नदी में मांसाहारी भोजन का अवशेष फेंकना हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को गंभीर रूप से आहत कर सकता है।



हालांकि, इस मामले में जेल में बंद आरोपियों द्वारा कोर्ट के समक्ष अपनी गलती स्वीकार करने और गहरा पश्चाताप व्यक्त करने के बाद, हाई कोर्ट ने उन्हें बड़ी राहत देते हुए सशर्त जमानत मंजूर कर ली है।

क्या था पूरा मामला?

यह पूरा विवाद वाराणसी के पंचगंगा घाट के पास गंगा नदी की लहरों पर एक नाव के भीतर कुछ युवकों द्वारा आयोजित की गई इफ्तार पार्टी से जुड़ा है। आरोप लगा था कि पार्टी के दौरान मांसाहारी भोजन खाया गया और उसके बाद बचे हुए अवशेष व हड्डियां पवित्र गंगा नदी में फेंक दी गईं।

इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के पदाधिकारियों ने वाराणसी के कोतवाली थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। पुलिस ने धार्मिक भावनाएं भड़काने और पूजा स्थल को अपवित्र करने जैसी कई गंभीर धाराओं के तहत केस दर्ज कर आरोपियों को गिरफ्तार किया था।

हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान क्या कहा?

निचली अदालत से जमानत याचिका खारिज होने के बाद आरोपियों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट की पीठ ने स्पष्ट किया कि कुछ लोगों के ऐसे कृत्यों से सामाजिक समरसता और धार्मिक सौहार्द बिगड़ सकता है। कोर्ट ने माना कि मांसाहारी भोजन का वेस्ट गंगा में फेंकना हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला कदम था।

"गंगा सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की अगाध आस्था का केंद्र है। नदी की पवित्रता को ठेस पहुंचाना समाज के ताने-बाने को नुकसान पहुंचा सकता है।" - इलाहाबाद हाई कोर्ट

लिखित माफीनामे के बाद मिली जमानत

भले ही कोर्ट ने इस कृत्य को गंभीर माना, लेकिन आरोपियों की ओर से कोर्ट में बाकायदा एक हलफनामा (Affidavit) दाखिल किया गया, जिसमें उन्होंने समाज में पहुंची ठेस के लिए गहरा और सच्चा पश्चाताप व्यक्त किया। आरोपियों ने लिखित में आश्वासन दिया कि वे भविष्य में कभी भी ऐसा कोई काम नहीं दोहराएंगे जिससे किसी की आस्था को चोट पहुंचे। इसी माफीनामे और हलफ़नामे को आधार मानते हुए हाई कोर्ट ने आरोपियों को सशर्त जमानत पर रिहा करने का आदेश दे दिया है।

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