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गाय से ख़तरा? या पाखंड से पर्दा उठता हुआ एक दृश्य
मसला यह नहीं है कि मंच पर क्या हुआ। मसला यह है कि उस दृश्य का अर्थ क्या है — और वह अर्थ उस राजनीति के चेहरे से कैसे पर्दा हटाता है, जो वर्षों से आस्था के नाम पर सत्ता का खेल खेलती रही है।
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यक्रम के दौरान एक गाय सुरक्षा घेरा तोड़ते हुए सामने आ गई। वीडियो वायरल हुआ, हेडलाइन बनी — “सुरक्षा में भारी चूक” — और देखते ही देखते एक नगर निगम सुपरवाइज़र निलंबित कर दिया गया।
पहली नज़र में यह एक सामान्य प्रशासनिक घटना लग सकती है। लेकिन अगर हम ज़रा ठहरकर सोचें, तो यह दृश्य एक ऐसे गहरे पाखंड को उजागर करता है जिसे बरसों से सामान्य बना दिया गया है।
सवाल यह नहीं है कि गाय मंच तक कैसे पहुँच गई। सवाल यह है कि — जिस गाय के नाम पर इंसानों को मारा गया, उसी गाय से अचानक ख़तरा कैसा?
क्या उस गाय के पास कोई हथियार था? क्या वह किसी साज़िश का हिस्सा थी? क्या उसने किसी पर हमला किया? नहीं।
फिर भी उसे “सुरक्षा चूक” का प्रतीक बना दिया गया। और उसी पल यह साफ़ हो गया कि गाय तब तक पवित्र है, जब तक वह राजनीति के काम आती है। जब वह सत्ता की असुविधा बन जाए, तो वही गाय — “ख़तरा” कहलाने लगती है।
यही वही गाय है जिसके नाम पर —
• मॉब लिंचिंग को जायज़ ठहराया गया
• इंसानों की पहचान उनके नाम और धर्म से की गई
• भीड़ को क़ानून से ऊपर खड़ा कर दिया गया
तब कहा गया —
“गौमाता की रक्षा ज़रूरी है।”
आज वही गौमाता सत्ता के इतने पास आ जाए,
तो कहा जाता है —
“सुरक्षा में भारी चूक।”
यह घटना किसी गाय की नहीं, राजनीतिक नैतिकता की परीक्षा है — और उस परीक्षा में यह व्यवस्था बुरी तरह फेल होती दिखती है।
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सच यह है कि समस्या न गाय है, न आस्था। समस्या है — आस्था का चयनात्मक इस्तेमाल।
जब प्रतीक वोट दिलाए, तो वह पवित्र। जब वही प्रतीक सवाल खड़ा करे, तो वह खतरा।
यही इस पूरे घटनाक्रम का निचोड़ है।
और इतिहास इसे एक छोटी सी खबर की तरह नहीं, बल्कि एक बड़े पाखंड के खुलासे की तरह याद रखेगा।

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