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मानवता का असली चेहरा: पिता का अंतिम संस्कार मुसलमानों ने कराया, हिंदू बच्चे की आँखों में आंसू

 

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पिता का शव लेकर भटकते रहे मासूम, मुसलमानों ने कराई अंतिम यात्रा |यह खबर उन लोगों के लिए आईना है जो हर बार नफ़रत का ज़हर बोने की कोशिश करते हैं। | उत्तर प्रदेश के महराजगंज से एक ऐसी दिल दहलाने वाली खबर सामने आई है | यह कहानी है लव कुमार पटवा की | जिनकी लंबी बीमारी के बाद मौत हो गई। |समझ गया भाई 👍

📰Times Watch - दम तोड़ते सच को बचाने की कोशिश,

30 अगस्त 2025

📰नई दिल्ली


पिता का शव ले कर भटकते रहे मासूम दो मुस्लिम 

फरिश्तों ने कराया अंतिम ससंकार 

महाराजगंज (यूपी): का है ये दिल को झकझोर कर देने वाला वाकिया 

Times Watch की रिपोर्ट: इंसानियत की मिसाल

उत्तर प्रदेश के महराजगंज से एक ऐसी दिल दहलाने वाली खबर सामने आई है, जिसने पूरे समाज को झकझोर दिया है। जब अपनों ने, खून के रिश्तों ने और पूरे समाज ने मुंह मोड़ लिया, तब इंसानियत के दो फरिश्ते सामने आए।

यह कहानी है लव कुमार पटवा की, जिनकी लंबी बीमारी के बाद मौत हो गई। उनकी पत्नी का निधन पहले ही हो चुका था और वे अपने तीन छोटे बच्चों के साथ रह रहे थे। लव कुमार की मौत के बाद उनके बच्चे, जिनमें सबसे बड़ा 14 साल का राजवीर था, पूरी तरह से बेसहारा हो गए।

बच्चों ने पिता के अंतिम संस्कार के लिए रिश्तेदारों और पड़ोसियों से मदद मांगी, लेकिन कोई आगे नहीं आया। जब हर दरवाजा बंद हो गया, तो उन्होंने पिता का शव एक ठेले पर रखा और अंतिम संस्कार के लिए जगह और मदद की तलाश में भटकने लगे। वे श्मशान गए, लेकिन पैसे न होने के कारण उन्हें वापस भेज दिया गया। फिर वे कब्रिस्तान गए, लेकिन वहां भी धर्म के नाम पर उन्हें लौटा दिया गया।

रोते हुए हिंदू बच्चे के साथ खड़े मुस्लिम युवक, पिता के दाह संस्कार में साथ देते हुए — इंसानियत की मिसाल



घंटों तक बच्चे सड़क पर रोते रहे, लेकिन उनकी बेबसी किसी को नजर नहीं आई। इसी दौरान, राशिद कुरैशी और वारिस कुरैशी नाम के दो मुस्लिम भाइयों ने उन्हें देखा। उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के आगे बढ़कर बच्चों की मदद करने का फैसला किया।

उन्होंने पैसे और अंतिम संस्कार की लकड़ियों का इंतजाम किया और हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार लव कुमार का अंतिम संस्कार करवाया। इस दुखद घटना में, जहां समाज और अपनों ने मुंह मोड़ लिया, वहीं इन दो मुस्लिम भाइयों ने इंसानियत की एक अनोखी मिसाल पेश की, जिसने यह साबित कर दिया कि इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।

16 साल का मासूम अपने पिता का शव लेकर घंटों भटकता रहा। समाज से, सिस्टम से मदद न मिली — लेकिन इंसानियत ने उसका साथ नहीं छोड़ा। मोहल्ले के कुछ मुस्लिम युवकों ने न सिर्फ आगे बढ़कर मदद की, बल्कि पूरे सम्मान के साथ शव का अंतिम संस्कार भी कराया।

जहाँ कुछ लोग हर घटना को हिंदू–मुस्लिम एंगल देने में लगे रहते हैं, वहीं यह घटना बताती है कि असली धर्म इंसानियत है।

लड़के की आँखों में आँसू थे, कंधे पर ग़म का बोझ, लेकिन साथ खड़े मुस्लिम भाइयों ने यह यकीन दिलाया कि मुश्किल वक्त में इंसान इंसान के काम आता है, मज़हब नहीं पूछता।

असली तस्वीर:

यह खबर उन लोगों के लिए आईना है जो हर बार नफ़रत का ज़हर बोने की कोशिश करते हैं। क्योंकि यहाँ तो वही लोग आगे आए, जिनके बारे में अक्सर नफ़रत फैलाने वाले सवाल खड़े करते हैं।

"मौत ने जुदा किया, इंसानियत ने गले लगाया" – यही इस घटना की सबसे बड़ी सीख है।


👉 थंबनेल/पोस्टर के लिए लाइन लिख सकते हैं:
"हिंदू पिता की चिता… मुस्लिम भाइयों का सहारा – इंसानियत ज़िंदा है"



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