हम खबरों में से खबर निकालते हैं — बाल की खाल की तरह।
जिसे हल्के में लिया गया, वही अब सत्ता के लिए भारी पड़ रहा है
✍️ रिज़वान की क़लम से
भारतीय राजनीति का सबसे स्थायी व्यंग्य यही है कि राहुल गांधी जो बात आज कहते हैं, उसे पहले मज़ाक बनाया जाता है, फिर टीवी डिबेट में कुचला जाता है, और कुछ वक्त बाद— वही बात सत्ता के मुंह से “गंभीर चिंता” बनकर निकलती है।
राहुल गांधी जिन सवालों पर कल तक मज़ाक उड़ाया गया, आज वही बातें सत्ता पक्ष के मुंह से निकल रही हैं। वोटर लिस्ट से 4 करोड़ नाम कटने का मुद्दा लोकतंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
कल तक कहा गया— “हार का बहाना है” आज वही बात सुनाई दे रही है— “4 करोड़ मतदाताओं के नाम कट गए” बस फर्क इतना है कि अब कहने वाला बदल गया है।
राहुल बोले तो गलत, सत्ता बोले तो गंभीर
राहुल गांधी अगर कहें कि वोटर लिस्ट में गड़बड़ी है— तो एंकर हंसते हैं, पैनलिस्ट चिल्लाते हैं, और देश को बताया जाता है कि लोकतंत्र पूरी तरह सुरक्षित है।
लेकिन जब वही बात सत्तापक्ष के नेता कह दें— तो अचानक मामला बन जाता है “लोकतांत्रिक चिंता” का।
बात गलत नहीं थी,
बस बोलने वाला गलत था।
चुनाव आयोग — सब देखता है, कुछ नहीं बोलता
अगर सचमुच 4 करोड़ वोटरों के नाम कटे हैं, तो यह कोई मामूली आंकड़ा नहीं, यह लोकतंत्र की रीढ़ पर चोट है।
मगर न प्रेस कॉन्फ्रेंस, न राज्यवार डेटा, न कोई जवाबदेही।
शायद आयोग भी इंतज़ार कर रहा है— जब सत्ता पूरी तरह बोले, तभी बोलना सुरक्षित होगा।
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| कल जिन सवालों पर ठहाके लगे, आज वही सत्ता की ज़ुबान बन गए। |
राहुल गांधी की असली गलती
राहुल गांधी की गलती यह नहीं है कि वे गलत बोलते हैं। उनकी गलती यह है कि वे—
- सच बहुत जल्दी बोल देते हैं
- सवाल सीधे पूछ लेते हैं
- और संविधान को अब भी जिंदा मानते हैं
इसीलिए पहले उनकी बात को नकारा जाता है, फिर उसी बात को रीब्रांड कर सत्ता की जुबान पर रख दिया जाता है।
असल व्यंग्य क्या है?
असल व्यंग्य यह नहीं है कि राहुल गांधी सही साबित हो रहे हैं।
असल व्यंग्य यह है कि सिस्टम खुद को अपनी ही ज़ुबान से पकड़वा रहा है।
समस्या राहुल गांधी नहीं थे,
समस्या सच से एलर्जी थी।
निष्कर्ष
हो सकता है आज भी कहा जाए— “राहुल गांधी सही नहीं थे।”
लेकिन इतिहास जानता है— सच पहले बदनाम होता है, फिर अपनाया जाता है।
और इस देश में ना चाहते हुए ही सही— राहुल गांधी की बात आख़िरकार सत्ता के मुंह से निकल ही जाती है।
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