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💥 ₹10,000 पहले बाँट दिए, अब वापस मांगे जा रहे हैं
चुनावी जल्दबाज़ी, प्रशासनिक लापरवाही और चुनाव आयोग की खामोशी
✍️ रिज़वान अहमद की कलम से
बिहार में इन दिनों एक अजीब और डरावना तमाशा चल रहा है। कल तक जिन गरीबों, छात्रों और महिलाओं के खातों में ₹10,000 की रकम “सरकारी सौग़ात” बनकर डाली जा रही थी, आज उन्हीं लोगों को सरकारी नोटिस भेजकर कहा जा रहा है — “पैसे वापस करो, आप पात्र नहीं थे।”
सवाल सिर्फ पैसे का नहीं है। सवाल नीयत का है, सवाल टाइमिंग का है और सवाल लोकतंत्र का है।
❓ इतनी क्या जल्दी थी पैसे डालने की?
अगर आज सरकार खुद मान रही है कि गलत लाभार्थियों को पैसा गया, फर्जीवाड़ा हुआ और पात्रता की शर्तें पूरी नहीं थीं, तो फिर पैसा डालने से पहले जांच क्यों नहीं हुई?
क्यों पहले DBT किया गया, बाद में Verification की बात आई और अब Recovery Mode चालू हो गया? यह प्रशासनिक भूल नहीं बल्कि सोची-समझी जल्दबाज़ी प्रतीत होती है।
🗳️ चुनावी मौसम और पैसों की बारिश — संयोग नहीं
बिहार की जनता मूर्ख नहीं है। उसे साफ दिख रहा है कि पैसे चुनावी माहौल में डाले गए, “सरकार दे रही है” का नैरेटिव बनाया गया और चुनाव निकलते ही सुर बदल गया — “गलती हो गई।”
अगर जांच पहले होती तो न प्रचार होता, न हेडलाइन बनती और न ही वोट पर असर पड़ता। इसलिए नीति साफ थी — जांच बाद में, फायदा पहले।
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| प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार — चुनावी माहौल में लागू की गई योजनाओं के तहत खातों में डाली गई ₹10,000 की राशि, अब वसूली के नोटिसों को लेकर सवालों के घेरे में। |
⚠️ असली अपराधी कौन?
आज उंगली गरीब, छात्र और आम लाभार्थी पर उठाई जा रही है, लेकिन असली सवाल यह है कि बिना जांच पैसे डालने का फैसला किसने लिया? किस अधिकारी ने साइन किया और किस राजनीतिक दबाव में यह हड़बड़ी हुई?
🏛️ चुनाव आयोग की खामोशी
चुनाव से ठीक पहले करोड़ों रुपये की योजनाएँ, सीधे खातों में ट्रांसफर और बाद में उन्हीं पैसों की वसूली — यह सीधा-सीधा Model Code of Conduct का सवाल है।
लेकिन न चुनाव आयोग ने रोका, न सवाल उठाया, न जवाब माँगा। यह खामोशी संवैधानिक कमजोरी की ओर इशारा करती है।
✊ निष्कर्ष
यह गरीबों की गलती नहीं, यह सिस्टम की साजिश है। यह प्रशासनिक भूल नहीं, यह चुनावी रणनीति है।
जब सत्ता वोट के लिए पैसा बाँटे और बाद में उसी जनता से पैसा छीने — तो समझ लीजिए, लोकतंत्र बीमार है।

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