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“घर में भी इजाज़त लेकर नमाज़ पढ़ो” — देहरादून की सड़कों पर खुला एलान, कैमरे में कैद हुई नफ़रत
रिज़वान की क़लम से
सोचिए… आप अपने ही घर में हैं। न कोई हथियार, न कोई नारा, न कोई प्रदर्शन। सिर्फ़ अल्लाह के सामने सिर झुकाने की तैयारी।
और तभी दरवाज़े पर दस्तक नहीं, धमकी आती है —
“घर में भी इजाज़त लेकर नमाज़ पढ़ो!”
यह कोई कहानी नहीं है। यह कोई अफ़वाह नहीं है। यह वायरल वीडियो है — जो उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से सामने आया है।
वीडियो में साफ़ दिखता है कि किस तरह कुछ लोग, खुलेआम, पूरे आत्मविश्वास के साथ, मुसलमानों को नमाज़ पढ़ने से रोक रहे हैं। गाली-गलौज कर रहे हैं। धमका रहे हैं।
और सबसे डरावनी बात?
सब कुछ पुलिस के सामने हो रहा है।
वर्दी मौजूद है। सरकारी गाड़ी मौजूद है। कानून मौजूद है।
लेकिन इंसाफ़ ग़ायब है।
कैमरे में कैद हुई एक सिहरन
वायरल वीडियो में कोई छिपकर नहीं बोल रहा। कोई डरकर नहीं बोल रहा।
आवाज़ें बुलंद हैं। चेहरों पर नफ़रत है। और शब्दों में एक ही संदेश —
“तुम्हें यहाँ अपनी इबादत का भी हक़ नहीं।”
यह वही देहरादून है, जिसे शांत पहाड़ों की राजधानी कहा जाता है। जहाँ अमन की मिसालें दी जाती थीं।
आज उसी शहर में, धर्म पूछा जा रहा है, इजाज़त माँगने को कहा जा रहा है।
यह सिर्फ़ नमाज़ नहीं, यह एक चेतावनी है
आज नमाज़ पर सवाल है। कल रोज़े पर होगा। परसों नाम पर।
आज कहा जा रहा है — “घर में भी इजाज़त लो”
कल कहा जाएगा — “घर भी हमारा नियम माने”
यह वीडियो सिर्फ़ एक घटना नहीं है। यह उस सोच का आईना है जो अब कैमरे से डरती नहीं।
जो जानती है कि सत्ता मौन है, प्रशासन चुप है, और डर सही लोगों के दिलों में बैठ चुका है।
पुलिस की चुप्पी सबसे ऊँची आवाज़
वीडियो में पुलिस है। लेकिन वह बीच-बचाव नहीं करती।
न धमकी देने वालों को रोकती है। न पीड़ितों को ढांढस बंधाती है।
बस खड़ी रहती है।
और यही खामोशी सबसे ज़्यादा डराती है।
क्योंकि जब कानून चुप हो जाए, तो नफ़रत बोलने लगती है।
सवाल जो इस वीडियो ने छोड़ दिए
- क्या अब मुसलमान अपने घर में भी सुरक्षित नहीं?
- क्या इबादत अब “अनुमति” का विषय बन चुकी है?
- और क्या पुलिस की खामोशी, नफ़रत के लिए लाइसेंस है?
देहरादून का यह वीडियो आज सिर्फ़ एक शहर की कहानी नहीं।
यह आने वाले भारत की झलक है — जहाँ कैमरे के सामने भी इंसान डर रहा है।
Times Watch देश दुनिया इस वीडियो को सिर्फ़ वायरल कंटेंट नहीं मानता, बल्कि इसे एक चेतावनी समझता है — कि अगर आज सवाल नहीं उठे, तो कल आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं बचेगा।
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