हम खबरों में से खबर निकालते हैं — बाल की खाल की तरह।
✒️ रिजवान की कलम से
जब सत्ता सवालों से डरने लगे,
तो संस्थाएँ ढाल बना दी जाती हैं।
जब जनता वोट दे,
और फ़ैसले कोई और करे—
तो उसे लोकतंत्र नहीं,
नियंत्रित व्यवस्था कहा जाता है।
दिल्ली का उपराज्यपाल कभी
चुनी हुई सरकार के ऊपर बैठा दिखता है,
कभी सत्ता बदलते ही
इतिहास के हाशिये में चला जाता है।
ये चुप्पी मासूम नहीं है—
ये चुप्पी इशारों पर चलने का सबूत है।
यह लेख किसी व्यक्ति के खिलाफ़ नहीं,
उस व्यवस्था के खिलाफ़ है
जहाँ संविधान की व्याख्या
सत्ता की ज़रूरत के हिसाब से बदल दी जाती है।
सवाल इसलिए ज़रूरी हैं
क्योंकि जवाब देने वाले
अब बोलते नहीं—
बस आदेश मानते है।
दिल्ली का उपराज्यपाल: केजरीवाल के दौर में मालिक, भाजपा सरकार में लापता क्यों?
जब सत्ता बदली, तो क्या संविधान की व्याख्या भी बदल गई?
✒️ रिजवान की कलम से
जब सत्ता सवालों से डरने लगे,
तो संस्थाएँ ढाल बना दी जाती हैं।
जब जनता वोट दे,
और फ़ैसले कोई और करे—
तो उसे लोकतंत्र नहीं,
नियंत्रित व्यवस्था कहा जाता है।
सवाल इसलिए ज़रूरी हैं
क्योंकि जवाब देने वाले
अब बोलते नहीं—
बस आदेश मानते हैं।
दिल्ली में एक दौर ऐसा भी था जब उपराज्यपाल (LG) खुद को चुनी हुई सरकार से ऊपर समझता था। हर फ़ाइल, हर फ़ैसले और हर योजना पर उसकी मुहर ज़रूरी मानी जाती थी। वह दौर था — अरविंद केजरीवाल की सरकार का।
उस समय LG सिर्फ़ संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति नहीं था, बल्कि ऐसा प्रतीत होता था मानो दिल्ली का असली शासक वही हो। मंत्रियों के आदेश रोके गए, फ़ैसलों को पलटा गया और चुनी हुई सरकार को अदालतों में घसीटा गया।
LG की भूमिका या केंद्र की रिमोट कंट्रोल व्यवस्था?
संविधान के अनुसार उपराज्यपाल की भूमिका संतुलन और मर्यादा में होनी चाहिए, लेकिन केजरीवाल सरकार के दौरान LG का व्यवहार केंद्र सरकार के राजनीतिक प्रतिनिधि जैसा दिखाई देता रहा।
- फ़ाइलें रोकी गईं
- योजनाएं अटकाई गईं
- अफसरों को चुनी हुई सरकार से ऊपर कर दिया गया
- हर फैसले में टकराव पैदा किया गया
भाजपा की सरकार आई… और LG ग़ायब हो गया
आज वही दिल्ली है, वही LG है, वही संविधान है — लेकिन अब न कोई टकराव है, न कोई संवैधानिक व्याख्यान।
तो सवाल सीधा है —
क्या LG सिर्फ़ तब सक्रिय होता है जब सामने विपक्ष हो?
क्या संविधान की रक्षा चयनात्मक होती है?
संविधान या सत्ता — किसके साथ है LG?
अगर उपराज्यपाल सच में निष्पक्ष होता, तो हर सरकार के साथ उसका व्यवहार एक जैसा होता। लेकिन हकीकत यह है कि LG का सक्रिय या निष्क्रिय होना दिल्ली से नहीं, केंद्र की सत्ता से तय होता है।
निष्कर्ष
दिल्ली का उपराज्यपाल कोई अदृश्य पद नहीं है। उसका अचानक ग़ायब हो जाना निष्पक्षता नहीं, बल्कि राजनीतिक चयनात्मकता का संकेत है।
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संविधान तब तक ही पवित्र है, जब तक वह सत्ता के रास्ते में खड़ा न हो।
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