पालक्काड की हैट्रिक: BJP की जीत या चुनावी दौर पर उठते सवालों की परछाईं?
सीमित शहरी जीत को केरल की फतह बताने की कोशिश और संस्थागत भरोसे की बहस
रिज़वान की कलम से:
चुनाव सिर्फ जीत-हार का नाम नहीं होता, चुनाव लोकतंत्र की आत्मा का इम्तिहान भी होता है।
जब किसी नतीजे पर सवाल उठें, तो सवाल उठाना साज़िश नहीं बल्कि नागरिक जिम्मेदारी बन जाता है।
पालक्काड की इस जीत को भी इसी कसौटी पर परखना ज़रूरी है।
केरल के पालक्काड नगर पालिका चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने लगातार तीसरी बार जीत दर्ज की है। 53 सदस्यीय परिषद में 25 सीटें हासिल कर पार्टी एक बार फिर सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है। लेकिन असली सवाल सीटों की संख्या से बड़ा है — क्या यह सचमुच BJP की वैचारिक जीत है?
इस नतीजे को “केरल में BJP की स्वीकार्यता” बताना ज़मीनी हकीकत से आंख चुराने जैसा होगा। केरल आज भी विधानसभा और लोकसभा स्तर पर BJP को व्यापक समर्थन नहीं देता। पालक्काड की जीत दरअसल केरल नहीं, एक नगर पालिका की कहानी है।
यह जीत विचारधारा की लहर से नहीं, बल्कि स्थानीय समीकरणों से उपजी है — LDF और UDF की आपसी कमजोरियां, शहरी एंटी-इनकम्बेंसी, और सीमित लेकिन संगठित वोट बैंक। यही वजह है कि BJP जीतती है, लेकिन राज्य में फैल नहीं पाती।
इस जीत का समय भी उतना ही अहम है। यह नतीजा ऐसे दौर में आया है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर देशभर में बहस चल रही है।
यह लेख किसी व्यक्ति पर सीधा आरोप नहीं लगाता, लेकिन यह सवाल जरूर करता है कि क्या चुनावी संस्थाओं पर भरोसा पहले जैसा मजबूत है? जब संस्थागत निष्पक्षता पर बहस हो, तब हर जीत सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक कसौटी भी बन जाती है।
BJP इस नतीजे को केरल में “पैर जमाने” के संकेत के रूप में पेश कर सकती है, लेकिन सच्चाई यह है कि यह न तो व्यापक जनादेश है, न ही 2026 के विधानसभा चुनाव का पूर्व संकेत।
पालक्काड की यह हैट्रिक राहत जरूर है, लेकिन भविष्य की गारंटी नहीं। इसे “केरल की फतह” नहीं, बल्कि विवादित चुनावी माहौल के बीच मिली सीमित शहरी जीत कहना ही ईमानदार पत्रकारिता होगी।
स्तंभ: रिज़वान की कलम

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