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भारत-अमेरिका व्यापार समझौता: रूस की दोस्ती की परीक्षा
टैरिफ में होगी जबरदस्त कटौती, लेकिन रूसी तेल खरीद में कटौती की शर्त | गोयल का सख्त संदेश - 'बंदूक की नोक पर डील नहीं'
नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच ऐतिहासिक व्यापार समझौता अब सिर्फ दस्तखत दूर है। सरकारी सूत्रों ने शुक्रवार को खुलासा किया कि दोनों देशों के बीच अधिकांश मुद्दों पर सहमति बन चुकी है और अब केवल समझौते की कानूनी भाषा को अंतिम रूप दिया जा रहा है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "हम डील को लेकर बहुत करीब हैं और अब कोई बड़ी बाधा नहीं बची है।"
मार्च से अब तक पांच दौर की वार्ताएं पूरी हो चुकी हैं और गुरुवार को हुई वर्चुअल बैठक में तकनीकी मुद्दों पर चर्चा की गई। राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी ने फरवरी में निर्देश दिया था कि 2025 के अंत तक पहला चरण पूरा हो जाए, और दोनों पक्ष इस समयसीमा को पूरा करने को लेकर आशावान हैं।
🔥 मुख्य बिंदु
• टैरिफ कटौती: 50% से घटकर 15-16% होगा
• लक्ष्य: 2030 तक व्यापार $191 बिलियन से $500 बिलियन
• शर्त: रूसी तेल आयात में धीरे-धीरे कटौती
• भारत का रुख: किसी दबाव में नहीं आएंगे
50% से 15%: टैरिफ में राहत
इस समझौते का सबसे बड़ा आकर्षण है अमेरिकी टैरिफ में भारी कटौती। मौजूदा 50 प्रतिशत का टैरिफ घटकर महज 15-16 प्रतिशत रह जाएगा, जो भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ी राहत साबित होगा। ट्रंप प्रशासन ने रूसी तेल आयात के कारण 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाया था, जिससे कुल टैरिफ 50 प्रतिशत तक पहुंच गया था।
इस समझौते का महत्वाकांक्षी लक्ष्य मौजूदा 191 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार को 2030 तक बढ़ाकर 500 अरब डॉलर तक पहुंचाना है।
रिलायंस ने शुरू की कटौती
जमीनी हकीकत यह है कि भारत की सबसे बड़ी रूसी तेल खरीदार कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज ने पहले ही रोसनेफ्ट के साथ अपने दीर्घकालिक अनुबंध के तहत तेल आयात रोकने का फैसला कर लिया है। यह करीब 5 लाख बैरल प्रतिदिन की आपूर्ति थी। अब रिलायंस मध्य पूर्व और अमेरिका से तेल खरीद रही है।
अमेरिका ने रूस की दो बड़ी तेल कंपनियों - रोसनेफ्ट और लुकोइल पर प्रतिबंध लगा दिए हैं, जिससे भारतीय रिफाइनरियों के लिए रूसी तेल खरीदना मुश्किल हो गया है।
असली मुद्दा: रूसी तेल
इस व्यापार समझौते की सबसे बड़ी और सबसे विवादास्पद शर्त है - भारत का रूस से तेल आयात में कटौती करना। अमेरिका चाहता है कि भारत अपने कुल तेल आयात का 34 प्रतिशत हिस्सा, जो अभी रूस से आता है, उसे धीरे-धीरे कम करे और मध्य पूर्व तथा अमेरिकी तेल की ओर रुख करे।
राष्ट्रपति ट्रंप ने दो बार सार्वजनिक रूप से दावा किया है कि प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें फोन पर आश्वासन दिया है कि भारत रूसी तेल खरीद में "काफी कटौती" करेगा। हालांकि, भारत सरकार ने इस पर कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया है।
भारत के लिए महंगा सौदा?
विशेषज्ञों का कहना है कि रूसी तेल छोड़ना भारत के लिए महंगा पड़ सकता है। 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने भारी छूट पर रूसी तेल खरीदना शुरू किया था। हालांकि 2023 में रूसी तेल पर छूट 23 डॉलर प्रति बैरल थी, जो अब घटकर केवल 2-2.50 डॉलर प्रति बैरल रह गई है।
जापानी बैंक नोमुरा का कहना है कि रूसी तेल से दूरी बनाने की अल्पकालिक लागत अमेरिकी टैरिफ में कटौती के फायदे से कहीं ज्यादा कम होगी।
"हम जल्दबाजी में समझौते नहीं करते और न ही सिर पर बंदूक रखकर कोई डील करते हैं।"
गोयल का सख्त संदेश
हालांकि समझौते के करीब होने के बावजूद वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने शुक्रवार को बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में भारत का रुख साफ कर दिया। उन्होंने कहा, "हम जल्दबाजी में समझौते नहीं करते और न ही सिर पर बंदूक रखकर कोई डील करते हैं।"
गोयल ने जोर दिया कि भारत की सोच लंबी अवधि की है और देश किसानों, मछुआरों और एमएसएमई के हितों की रक्षा करेगा। उन्होंने संकेत दिया कि भारत अमेरिका के साथ वार्ता में रूस से तेल खरीद पर छूट की मांग भी उठाएगा।
अमेरिकी मक्का के लिए खुलेगा दरवाजा
समझौते के तहत भारत अमेरिकी गैर-आनुवंशिक संशोधित मक्का और सोयामील के लिए अपने बाजार के दरवाजे खोल सकता है। हालांकि, गोयल ने स्पष्ट किया है कि किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए कोई भी फैसला लिया जाएगा।
कब होगी घोषणा?
सूत्रों का कहना है कि इस महीने के अंत में होने वाले आसियान शिखर सम्मेलन में इस समझौते की घोषणा हो सकती है। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने भी आशा जताई है कि अगले दो महीनों में यह मुद्दा सुलझ जाएगा।
📌 निष्कर्ष: संतुलन की कोशिश
यह समझौता भारत के लिए एक नाजुक संतुलन साधने का मामला है - न तो पूरी तरह अमेरिकी दबाव में आना और न ही रूस को पूरी तरह छोड़ना। रूसी तेल खरीद कम होगी, बंद नहीं होगी, और यह कटौती धीरे-धीरे होगी। भारत अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता बनाए रखते हुए आर्थिक फायदे भी लेना चाहता है।
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