डॉलर के सामने पस्त हुआ भारतीय रुपया, लेकिन कुछ एशियाई देशों की चांदी क्यों? जानिए इस खेल के पीछे का असली गणित

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श्रेणी/डेस्क:  . राजनीति / राष्ट्रीय] दिनांक: [28/05/2026
लेखक/संवाददाता: [रिजवान अहमद] स्थान: [नई दिल्ली]

डॉलर के सामने पस्त हुआ भारतीय रुपया, लेकिन कुछ एशियाई देशों की चांदी क्यों? जानिए इस खेल के पीछे का असली गणित

नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर के आगे भारतीय रुपये की सेहत लगातार बिगड़ती जा रही है। रुपया हर दिन गिरावट के नए रिकॉर्ड बना रहा है, जिससे आम आदमी से लेकर बाजार तक हर कोई हैरान है। लेकिन इस कहानी का सबसे दिलचस्प मोड़ यह है कि जहां एक तरफ भारत का रुपया गोता लगा रहा है, वहीं दूसरी तरफ कुछ छोटे एशियाई देशों की मुद्राएं डॉलर के सामने मजबूती से सीना ताने खड़ी हैं। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? आइए इसके पीछे के असली आर्थिक खेल को आसान भाषा में समझते हैं।

पहला बड़ा झटका: कच्चे तेल की महंगाई

इस पूरी गिरावट के पीछे सबसे बड़ा विलेन कच्चा तेल (Crude Oil) है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी तेल विदेशों से खरीदता है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल के दाम आसमान छू रहे हैं। अब भारत को तेल खरीदने के लिए तिजोरी से भारी मात्रा में डॉलर बाहर भेजने पड़ रहे हैं। बाजार में डॉलर की डिमांड इतनी बढ़ गई है कि उसके सामने रुपया कमजोर होता जा रहा है।

मलेशिया और इंडोनेशिया की चांदी क्यों?

अब सवाल उठता है कि फिर बाकी एशियाई देश कैसे बच गए? असल में मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देश भारत की तरह तेल सिर्फ खरीदते नहीं हैं, बल्कि ये देश कच्चे तेल, कोयला और पाम ऑयल के बड़े निर्यातक (Exporters) भी हैं। जब दुनिया में इन चीजों के दाम बढ़ते हैं, तो इन देशों के पास खुद-ब-खुद भारी मात्रा में डॉलर खिंचे चले आते हैं। यही वजह है कि इनकी करेंसी (जैसे मलेशियाई रिंगिट) इस संकट में भी मजबूत बनी हुई है।

भारतीय रुपया बनाम अमेरिकी डॉलर गिरावट ग्राफ और मजबूत एशियाई मुद्राएं मलेशियाई रिंगिट और इंडोनेशियाई रुपिया - जुमला टाइम्स
ग्राफिक्स के जरिए समझिए: एक तरफ जहां डॉलर के सामने भारतीय रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर है, वहीं दूसरी तरफ कुछ एशियाई देश मुनाफे में हैं।


विदेशी निवेशकों का यू-टर्न

वैश्विक बाजार में मची उथल-पुथल को देखते हुए विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने भारतीय शेयर बाजार से अपना पैसा निकालना शुरू कर दिया है। निवेशक इस समय जोखिम वाले उभरते बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिका के सुरक्षित सरकारी बॉन्ड में शिफ्ट कर रहे हैं। भारत से बड़े पैमाने पर हो रही इस फंड की निकासी ने रुपये पर दबाव को और ज्यादा बढ़ा दिया है।

जानकारों की मानें तो जब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें शांत नहीं होतीं और विदेशी निवेशकों का भरोसा वापस नहीं लौटता, तब तक रुपये को इस दबाव से पूरी तरह राहत मिलना मुश्किल दिख रहा है।



संपादकीय प्रमुख
जुमला टाइम्स डिजिटल डेस्क

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