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UP Police पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की सबसे बड़ी टिप्पणी: "संविधान नहीं, सरकार के वफादार बन चुके हैं कुछ पुलिसवाले"
लखनऊ/प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली को लेकर अब तक की सबसे तीखी और गंभीर टिप्पणी की है। अदालत ने साफ तौर पर कहा है कि राज्य के कई पुलिस अधिकारियों की वफादारी संविधान के प्रति न होकर सत्ता में बैठे राजनीतिक आकाओं के प्रति दिखाई देती है।
जस्टिस विनोद दिवाकर की सिंगल बेंच ने गाजियाबाद के एक परिवार पर लगाए गए गैंगस्टर एक्ट को रद्द करते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
हाईकोर्ट की 4 सबसे तीखी टिप्पणियां: अफसरशाही पर उठाए गंभीर सवाल
अदालत ने यूपी पुलिस और ब्यूरोक्रेसी की कार्यप्रणाली का एक्स-रे करते हुए कई चौंकाने वाली बातें कहीं:
- पसंदीदा पोस्टिंग का 'इनाम': कोर्ट ने कहा कि जो अधिकारी राजनीतिक आकाओं को खुश रखते हैं, उन्हें शहरी कमिश्नरेट या 'मलाईदार' जिलों में पोस्टिंग का इनाम मिलता है। वहीं, निष्पक्ष और स्वतंत्र काम करने वाले अधिकारियों को सजा के तौर पर साइड पोस्टिंग दे दी जाती है।
- यूपी में 'सामंती सोच' हावी: फैसले में कहा गया कि राज्य की अफसरशाही पर आज भी एक सामंती मानसिकता हावी है, जिसने जनसेवा के संवैधानिक शासन को व्यक्तिगत प्रभुत्व का जरिया बना दिया है।
- कानून का टारगेटेड इस्तेमाल: अदालत ने चिंता जताई कि यूपी में 'एनकाउंटर किलिंग', चुनिंदा लोगों पर कार्रवाई और असुविधाजनक लोगों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट का टारगेटेड इस्तेमाल बढ़ा है।
- बिना प्रक्रिया के गिरफ्तारियां: कोर्ट ने माना कि राज्य में निजी स्वार्थों के लिए एफआईआर दर्ज की जा रही हैं या दबाई जा रही हैं, और प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक निरोध) का मनमाना इस्तेमाल हो रहा है।
यह पूरा मामला गाजियाबाद के राजेंद्र त्यागी और उनके परिवार से जुड़ा है। पुलिस ने एक जमीन और वित्तीय विवाद में पूरे परिवार पर गैंगस्टर एक्ट लगा दिया था, जिसमें घर की एक बुजुर्ग महिला को भी करीब 80 दिनों तक जेल में रहना पड़ा।
अदालत ने इसे कानून का खुला दुरुपयोग और अवैध बताते हुए केस को खारिज कर दिया। साथ ही गाजियाबाद के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर अजय कुमार मिश्रा की भूमिका पर भी सवाल उठाए कि उन्होंने बिना सोचे-समझे इस कार्रवाई को मंजूरी कैसे दी।
खबर का अंतिम हिस्सा यहाँ आएगा। अपनी इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म को अंजाम देते हुए आप यहाँ निष्कर्ष, सरकारी अधिकारियों के जवाब (यदि कोई हों) या जनता की मांग को लिखकर खबर को समाप्त कर सकते हैं।
अदालत का कड़ा संदेश: "पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के पद संवैधानिक प्रकृति के हैं। इन्हें व्यक्तिगत सुविधा या राजनीतिक लाभ का जरिया नहीं बनाया जाना चाहिए।"
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रिपोर्ट मथानी: विशेष संवाददाता (Special Correspondent) स्थान: नई दिल्ली / ब्यूरो |
प्रधान संपादक JUMLA TIMES |
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