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एक वीडियो, एक डेरी और 2014 के बाद का भारत: जब इंसानियत को ‘हिम्मत’ और नफ़रत को ‘धर्म’ कहा जाने लगा
रिजवान की कलम से
देहरादून के वर्तवाल चौक पर स्थित उत्तरांचल डेरी का यह वायरल वीडियो कोई साधारण क्लिप नहीं है। यह वीडियो दरअसल उस भारत का आईना है, जिसे 2014 के बाद व्यवस्थित रूप से गढ़ा गया — जहाँ किसी मुस्लिम का कारोबार अब सामान्य बात नहीं रह गया, और जहाँ उसके हक़ में खड़ा होना असाधारण साहस माना जाने लगा।
वीडियो में एक हिंदू दुकानदार, जिसे लोग चंद्रमणि के नाम से जानते हैं, खुलकर एक मुस्लिम डेरी मालिक के समर्थन में बोलता है। दूसरी ओर, कैमरे पर न आते हुए एक महिला की आवाज़ सुनाई देती है — धमकी भरे लहजे में। यह दृश्य बताता है कि आज के भारत में धमकी देने वालों को छुपने की ज़रूरत नहीं, और इंसानियत के साथ खड़े व्यक्ति को बहादुर कहा जाता है।
यही तो सबसे बड़ा सवाल है — आख़िर ऐसा हुआ कैसे? कब से किसी के साथ खड़ा होना ‘वीरता’ बन गया, और कब से किसी को उसकी पहचान के आधार पर डराना ‘सामान्य व्यवहार’?
2014 के बाद का भारत सिर्फ़ नीतियों से नहीं बदला, बल्कि सोच के स्तर पर बदला गया। नफ़रत को भाषा मिली, शक को नैतिकता का जामा पहनाया गया और भीड़ को यह भरोसा दिलाया गया कि वह जो कर रही है, वही राष्ट्रधर्म है।
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एक वीडियो, एक डेरी और 2014 के बाद का भारत |
गाय, धर्म, लव जिहाद, थूक जिहाद, पहचान — ये सब मुद्दे नहीं थे, बल्कि उपकरण थे। इन उपकरणों से एक ऐसा माहौल बनाया गया जिसमें मुस्लिम होना अपने आप में संदेह का कारण बन गया। और जब संदेह सामान्य हो जाता है, तो हिंसा देर-सबेर उसे फॉलो करती है।
आज स्थिति यह है कि एक डेरी चलाने वाला मुस्लिम भीड़ को जवाब नहीं देता — क्योंकि जवाब देने की ज़िम्मेदारी अब संविधान की नहीं, पड़ोसी की बन चुकी है। अगर कोई चंद्रमणि सामने आ जाए, तो राहत की सांस ली जाती है। और अगर न आए, तो चुप्पी को ही क़ानून मान लिया जाता है।
यह वीडियो इसलिए भी डराता है, क्योंकि इसमें कोई पुलिस नहीं दिखती। कोई प्रशासन नहीं। कोई कानून नहीं। बस आवाज़ें हैं — एक नफ़रत की, एक इंसानियत की। और सवाल यह है कि राज्य किस आवाज़ के साथ खड़ा है?
भाजपा के भारत में सबसे बड़ा बदलाव यही है — अब नफ़रत फैलाने वालों को सफ़ाई नहीं देनी पड़ती, और इंसानियत दिखाने वालों को सफ़ाई देनी पड़ती है।
देहरादून का यह वीडियो हमें यह नहीं बताता कि भारत कैसा है, यह बताता है कि भारत को किस तरह का बना दिया गया है।
यह भी समझना ज़रूरी है कि देहरादून का यह वीडियो न तो पहला है और न ही शायद आख़िरी। बीते वर्षों में ऐसे अनगिनत वीडियो सामने आए हैं, जहाँ किसी को उसकी पहचान के आधार पर घेरा गया, धमकाया गया या अपमानित किया गया — और फिर वही वीडियो वायरल होकर नफ़रत का ईंधन बन गए।
इसका कारण अज्ञानता नहीं, बल्कि भरोसा है। भरोसा इस बात का कि ऐसी हरकतों के बाद न तो सत्ता नाराज़ होगी, न ही व्यवस्था सवाल पूछेगी। बल्कि उलटा, ऐसे लोग यह मानकर चलते हैं कि वे अब भाजपा की नज़र में ‘उपयोगी’ हो जाएंगे — टीवी डिबेट्स में जगह मिलेगी, सोशल मीडिया पर समर्थन मिलेगा और कभी-कभी राजनीतिक संरक्षण भी।
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यही वजह है कि नफ़रत अब छुपकर नहीं फैलती, बल्कि कैमरे के सामने फैलाई जाती है। क्योंकि डर अब पीड़ित के हिस्से में है, और आत्मविश्वास उस भीड़ के पास है जो जानती है कि राजनीतिक हवा उसके साथ बह रही है।
जब किसी समाज में यह यक़ीन बैठ जाए कि नफ़रत फैलाकर आप सत्ता के करीब पहुँच सकते हैं, तो फिर ऐसे वीडियो रुकते नहीं हैं — वे एक पैटर्न बन जाते हैं। देहरादून का यह वीडियो उसी पैटर्न की एक और कड़ी है, चेतावनी है कि अगर आज इंसानियत बोल रही है और राज्य ख़ामोश है, तो कल ख़ामोशी ही सबसे बड़ा अपराध बन जाएगी।

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