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देश ठेके पर: जो खुद कुछ नहीं कर पाए, वो सबका भविष्य बेच आए
घर का ठेका मॉडल, देश पर लागू
सोचिए, किसी घर में एक शख्स खुद को मुखिया कहता है। लेकिन न उसे खाना बनाना आता है, न बच्चों की पढ़ाई की चिंता है, न बुज़ुर्गों की दवाई याद रहती है। फिर भी वो सबसे ऊपर बैठा है और फैसला वही लेता है।
वो क्या करता है? हर काम ठेके पर दे देता है।
- खाना बनाने का ठेका किसी कैटरिंग वाले को।
- बच्चों की पढ़ाई का ठेका ट्यूशन टीचर को।
- बुज़ुर्गों की देखभाल का ठेका किसी नर्स या एजेंसी को।
- घर की सफाई, सुरक्षा – हर चीज़ दूसरे के भरोसे।
और फिर वह गर्व से कहता है – "देखो, मेरा घर कितनी अच्छी तरह चल रहा है।" जबकि सच यह है कि घर उसके दम पर नहीं, ठेके पर चल रहा है।
जब देश भी ठेके पर चलने लगे
आज जो तस्वीर दिख रही है, उसमें जिम्मेदारी का ताज ऊपर बैठा व्यक्ति पहनता है, लेकिन असली काम का बोझ किसी और के कंधों पर डाल दिया जाता है। सिस्टम खुद संभालने की बजाय, सिस्टम को ही ठेके पर दे दिया जाता है।
मॉडल सीधा सा है:
- काम कोई और करेगा।
- मुनाफ़ा कोई और कमाएगा।
- लेकिन क्रेडिट के बड़े-बड़े पोस्टर सिर्फ ऊपर बैठे लोगों के नाम से छपेंगे।
जब फायदा दिखता है तो नारा लगता है – "यह हमने किया है।" और जब नुकसान सामने आता है तो बहाना तैयार रहता है – "यह तो मार्केट की मजबूरी है, ग्लोबल सिचुएशन है, हमारे हाथ में क्या है।"
ठेका मॉडल में सबसे सस्ता कौन?
इस पूरे खेल में सबसे सस्ता "आइटम" होता है आम आदमी की ज़िंदगी। ठेका मजदूर, कॉन्ट्रैक्ट टीचर, सिक्योरिटी गार्ड, डेटा एंट्री करने वाला नौजवान – सबकी मेहनत असली है, लेकिन उनकी नौकरी कागज़ पर लिखी एक अस्थायी लाइन से ज़्यादा कुछ नहीं होती।
- काम पूरा टेंशन वाला, जिम्मेदारी भारी, टाइम फिक्स नहीं।
- लेकिन नौकरी – जब चाहे खत्म कर दी जाए, इतना ही भरोसा।
जिनके हाथ में कल देश की कमान होनी चाहिए थी, वे आज ठेके पर काम ढूंढ रहे हैं। जिन संस्थानों पर जनता का भरोसा खड़ा होता था, उन्हें एक-एक कर कमजोर या किसी और के हवाले करने की तैयारी चल रही है।
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नेतागिरी: ठेका नहीं, जवाबदेही है
नेतागिरी का मतलब सिर्फ रिबन काटना, भाषण देना और फोटो खिंचवाना नहीं है। असली नेतागिरी का मतलब है – सिस्टम को खुद समझना, फैसले खुद लेना और गलती होने पर सीधे जनता के सामने जवाब देना।
आज तस्वीर उलटी दिखती है:
- फैसले कहीं और से लिखे जाते हैं।
- सिस्टम किसी और के ठेके पर चलाया जाता है।
- और जनता से कहा जाता है – "सब ठीक है, आप बस सवाल मत पूछिए।"
जो लोग खुद सिस्टम संभाल नहीं पा रहे, वही सिस्टम के नाम पर जनता से भरोसा मांग रहे हैं। यह विरोधाभास नहीं, खतरे की घंटी है।
घर बिगड़ा तो एक परिवार, देश बिगड़ा तो करोड़ों जिंदगियां
भाई, सच इतना ही है – जिन लोगों के खुद कुछ करना बस का नहीं होता, वे लोग सारा काम धंधा दूसरों से करवाते हैं। फर्क बस इतना है कि अगर एक घर बिगड़ता है, तो एक परिवार बरबाद होता है। लेकिन अगर देश ठेके पर चलाया जाता है, तो करोड़ों जिंदगियां दांव पर लग जाती हैं।
इसलिए सवाल यह नहीं कि आज सत्ता में कौन है। असली सवाल यह है:
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