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जब चुनाव आयोग ने अमिताभ बच्चन की आवाज़ तक बंद कर दी थी
और आज लोकतंत्र शोर में दम तोड़ रहा है
✍️ रिजवान की कलम से
कभी-कभी इतिहास आज के सवालों का जवाब नहीं देता— बल्कि आज की सच्चाई को बेहद शर्मनाक बना देता है।
आज जब चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उंगलियाँ उठती हैं, जब सत्ता पक्ष के प्रचार पर कोई लगाम नहीं दिखती, तो 1984 का एक वाक़या पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर देता है।
वह दौर, जब सत्ता कांग्रेस के हाथ में थी, और फिर भी चुनाव आयोग सत्ता से नहीं, संविधान से डरता था।
🕰️ 1984: सत्ता भी थी, सुपरस्टार भी — लेकिन छूट नहीं थी
साल 1984। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश ग़म और भावनाओं के सैलाब में था। कांग्रेस सत्ता में थी। और कांग्रेस ने इलाहाबाद से उम्मीदवार बनाया—
अमिताभ बच्चन।
वो अमिताभ, जिनकी एक आवाज़ पर सिनेमा हॉल तालियों से गूंज जाते थे, जिनका एक डायलॉग देश की धड़कन बन जाता था।
लेकिन चुनाव आयोग ने कहा—
“लोकप्रियता भी अगर चुनाव को प्रभावित करे, तो वह भी अनुचित है।”
📵 जब फिल्मों से पहले गाने चुप करा दिए गए
आज के दौर में यह सुनना अजीब लगता है, लेकिन यह काग़ज़ी नहीं, ज़मीनी सच्चाई है—
- ❌ दूरदर्शन पर अमिताभ बच्चन की फ़िल्में बंद
- ❌ रेडियो पर उनके गाने तक रोक दिए गए
- ❌ उनकी आवाज़ को “चुनावी प्रभाव” माना गया
यह सब उस देश में हुआ जहाँ सरकार भी कांग्रेस की थी और उम्मीदवार भी कांग्रेस का।
लेकिन—
चुनाव आयोग नहीं झुका।
⚖️ तब संस्थाएँ सत्ता के नीचे नहीं थीं
यह समझना ज़रूरी है—
यह फैसला न प्रधानमंत्री का था, न कैबिनेट का, न पार्टी दफ्तर का।
👉 यह फैसला था एक संवैधानिक संस्था का जिसे सत्ता की नाराज़गी से डर नहीं लगता था।
आज के भारत में ऐसी सख़्ती की कल्पना करना भी राजद्रोह जैसा माना जाता है।
📣 आज: प्रचार खुलेआम, निगरानी गायब
आज तस्वीर बिल्कुल उलट है—
- सरकारी योजनाएँ चुनावी भाषण बन चुकी हैं
- सरकारी विज्ञापन प्रचार पोस्टर हैं
- सरकारी मीडिया सत्ता का प्रवक्ता
और चुनाव आयोग?
या तो—
खामोश
या फिर इतना चयनात्मक कि सवाल उठना लाज़मी है।
🗣️ “गूंगे अमिताभ” — सवाल व्यक्ति से नहीं, दौर से है
यह तंज अमिताभ बच्चन पर निजी हमला नहीं है।
यह तंज है—
उस दौर पर जहाँ कभी उनकी आवाज़ लोकतंत्र के डर से बंद की गई थी,
और आज वही आवाज़—
- महंगाई पर खामोश
- बेरोज़गारी पर खामोश
- संविधान पर खामोश
तो सवाल उठता है—
क्या आज चुप रहना ही सबसे सुरक्षित अभिनय बन गया है?
🧨 असली खतरा क्या है?
खतरा यह नहीं कि एक अभिनेता बोल नहीं रहा।
खतरा यह है कि—
संवैधानिक संस्थाएँ बोलना छोड़ रही हैं।
जब चुनाव आयोग सत्ता को देख कर नियम तय करे,
तो लोकतंत्र सिर्फ़ चुनावी रस्म बनकर रह जाता है।
📌 निष्कर्ष: इतिहास गवाह है, सवाल आज का है
1984 याद दिलाता है—
✔️ सत्ता के रहते भी निष्पक्षता संभव थी ✔️ लोकप्रियता के बावजूद नियम लागू हुए ✔️ चुनाव आयोग रीढ़ के साथ खड़ा था
और आज—
❓ वही आयोग सवालों में है ❓ वही लोकतंत्र शक के घेरे में
लोकतंत्र तब नहीं मरता जब लोग बोलते हैं,
लोकतंत्र तब मरता है जब बोलने वाले चुप करा दिए जाते हैं— या चुप रहना सीख जाते हैं।
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