📰 मुख्य सूर्ख़ियाँ
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कल शाम से लिया गया सीज़फायर का वादा — लेकिन आज सुबह टैंक गोले बरसाने लगे
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ख़ाक में तब्दील मकान, जली चिता, आंसुओं की ज़मीं पर जीवन की पुकार
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संयुक्त राष्ट्र का सख़्त विरोध — “मानवता पर हमला” कहा
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67,000 से ज़्यादा मारे गए — उन में असंख्य बच्चे और बूढ़े
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आशा की किरण या फिर धोखा? — गाज़ा में निवासियों में संशय The Guardian+2AP News+2
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ग़ज़ा की धड़कनें डूब चुकी हैं।
हर इमारत अब बस धूल का कब्रगाह है, हर गली अनसुने आहों की गवाह।
कल रात को जो सीज़फायर की खनक सुनाई दी थी, आज सुबह टैंकों की दहाड़ों से फिर टूटी।
जहाँ लोगों ने ज़िंदगियाँ बचाने के लिए सिर हासिल किए — वहाँ गोले ने जवाब दिया।
बज गया मैदान फिर से विस्फोटों की लय से —
एक तरफ़ वादे और कागज़ की अफ़वाहें,
दूसरी तरफ़ जीवन की इमारतें धराशायी,
और वह अनकहा सवाल जो हर बच्चे, बूढ़े, माँ-बाप के दिल में धड़कता है:
“क्या कल की शांति सिर्फ़ एक आड़ थी?”
📖 युद्ध की स्याही — हालात का आलेख
1. सीज़फायर की घोषणा और झूठे कदम
इज़राइल सरकार ने कल रात एक सीज़फायर डील को मंज़ूरी दी —
मीडिया में यह दिखाया गया कि स्पर्धा को बंद किया जाएगा,
और बंदियों की अदला-बदली होगी। The Guardian+3AP News+3Financial Times+3
लेकिन सुबह होते ही गाज़ा की खान यूनिस और गाज़ा सिटी में
टैंकों की तोपें फिर गोले बरसा रही थीं। Al Jazeera+3Reuters+3Al Jazeera+3
अलजज़ीरा की रिपोर्ट बताती है कि हवाई हमले और टैंक हमले जारी रहे,
और सात शव गाज़ा सिटी के अस्पताल में पहुंचाए गए। Al Jazeera
इज़राइल का जिक्र है कि वो अपने सैनिकों को सीज़फायर रेखा तक पीछे ले जाएगा —
लेकिन क्या “पीछे हटना” मतलब “गोले न चलना” भी है? Reuters+1
2. तबाही और जख्म — गाज़ा की कहानी
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पिछले दो सालों में, 193,000 से ज़्यादा भवन उड़ाए गए या क्षतिग्रस्त हुए हैं।
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67,000 से अधिक फ़िलिस्तीनियों की जानें गईं —
उनमें से तिहाई से ज़्यादा बच्चे। The Guardian+2AP News+2
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अस्पतालों पर हमला, स्कूलों को निशाना बनाना, इलाज की कमी — ये सब अब रोज़मर्रा की त्रासदी। The Guardian+2AP News+2
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बड़े इलाकों को खाली कराना — और लोगों को तंबुओं में ज़िंदगी गुज़रने को मजबूर करना। Reuters+2The Guardian+2
3. विश्व समुदाय और प्रतिक्रिया
संयुक्त राष्ट्र ने इस हमले की कड़ी निंदा की है और इसे मानवता पर हमला बताया।
बड़ी राहत एजेंसियाँ कह रही हैं कि बैठे हुए वादे अब नहीं चलेंगे —
जब तक सुरक्षित सीज़फायर, मानवाधिकारों की सुरक्षा, और निरंतर सहायता न हो। Reuters+2The Guardian+2
गाज़ा के लोग — जो हर दिन मौत की हदों से पार जाते रहे —
अब इस नए “शांति” की झूठी आवाज़ों में पिघलने से डरते हैं।
कभी हुआ है कि वादा टूटे और गोली चले — आज वही हो रहा है।
💔 हमदर्दी शब्द — आवाज़ उनकी, जो सुनाई नहीं देती
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माँ, जिसने अपने बच्चे को गले से लगाने की भी हिम्मत नहीं की,
क्योंकि डर था कि हर सांस बंद हो जाए — राहत नहीं गोली मार दे।
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बच्चा, जिसने न पूछा था युद्ध को क्या है, लेकिन अब घूम-घूम कर
खाली प्लेट, खाली आंगन, और फिर से भागने की तस्वीर देखता है।
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बूढ़ा, जिसे बचपन में मिट्टी की शामें याद थीं —
आज टैंकों की धड़कन, गोले की चीत्कार और झुकता हुआ आसमान है।
ये लोग नहीं, जीते हुए ज़ख्म हैं —
और ये ज़ख्म “शांति” की अफ़वाहों से नहीं बंधेंगे।
🧷 टिकाऊ निष्कर्ष — शांति का सपना या ढोंग?
इस “सीज़फायर” ने एक बार फिर धोखा दिया है।
जहाँ शब्दों में शांति की खुशबू, वहाँ धूल और राख में ज़िंदगियाँ दम तोड़ रही हैं।
यदि कल केवल वादों का पत्र बन कर रह जाएगा,
तो गाज़ा की चिता आज से भी धू-धूकर कहेगी —
“हमारी लाशों की गाथा, इस दुनिया की पोल खोल दे”।
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