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सुप्रीम कोर्ट ने बिहार की मतदाता सूची पर चिंता जताते हुए चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। अदालत ने पूछा कि फाइनल लिस्ट में जोड़े गए नाम क्या उन्हीं मतदाताओं के हैं जिन्हें पहले हटाया गया था? Times Watch का विश्लेषण।
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Evening Edition | 07 अक्टूबर 2025
**बिहार वोटर लिस्ट पर सुप्रीम कोर्ट की सख़्ती — चुनाव आयोग से पूछा, “जोड़े गए नाम क्या उन्हीं के हैं जिन्हें पहले हटाया गया था?”**
🧭 Times Watch विश्लेषण
बिहार में जिस तरह से वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर नाम हटाए और जोड़े गए हैं, वह चुनावी निष्पक्षता के लिए गंभीर चिंता का विषय है। अगर यह सच में हुआ कि पुराने हटाए गए नाम दोबारा जोड़ दिए गए, तो यह **डेटा मैनेजमेंट और प्रक्रिया की भारी विफलता** को दर्शाता है। चुनाव आयोग को अब यह साबित करना होगा कि उसकी प्रक्रिया सिर्फ *कागजी सफाई नहीं*, बल्कि **लोकतांत्रिक पारदर्शिता की रक्षा** का एक ईमानदार प्रयास है।✍Rizwan....
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| Credit To Live Law |
रिपोर्ट: डैबी जैन | स्रोत: LiveLaw | समय: 7 अक्टूबर 2025, दोपहर 3:21 बजे | पढ़ने का समय: 9 मिनट
**सुप्रीम कोर्ट** ने बिहार की **अंतिम मतदाता सूची (Final Voters’ List)** में हुए बदलावों को लेकर **चुनाव आयोग (ECI)** से जवाब मांगा है। अदालत ने कहा कि यह साफ़ नहीं है कि फाइनल लिस्ट में जो **नए नाम जोड़े गए हैं**, क्या वे वास्तव में नए मतदाता हैं या **उन्हीं लोगों के नाम हैं जिन्हें पहले हटाया गया था**।
रिपोर्ट के मुताबिक, **ड्राफ्ट वोटर लिस्ट** में करीब **65 लाख नाम हटाए गए** थे, जबकि फाइनल सूची में **21 लाख नए नाम जोड़े गए** और **3.66 लाख और नाम हटाए गए**। अदालत ने कहा कि इतने बड़े पैमाने पर बदलाव “जनसांख्यिकीय भ्रम” पैदा कर रहे हैं और इससे **लोकतांत्रिक पारदर्शिता पर सवाल** उठते हैं।
याचिकाकर्ताओं (जिसमें **एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स - ADR** शामिल है) ने दलील दी कि मतदाताओं के नाम **बिना सूचना दिए** हटाए जा रहे हैं, और **हटाने का कारण** भी सार्वजनिक नहीं किया गया। इससे नागरिकों का **मतदान का संवैधानिक अधिकार (Right to Vote)** प्रभावित होता है।
“क्या जोड़े गए नाम नए हैं, या उन्हीं लोगों के जो पहले हटाए गए थे? यह स्पष्ट नहीं है।” — सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
अदालत ने **चुनाव आयोग को निर्देश** दिया है कि वह सभी विवरण पेश करे — किनके नाम हटाए गए, किनके जोड़े गए, और क्या कोई **दोहराव या पुन:प्रवेश (re-entry)** हुआ है। साथ ही अदालत ने कहा कि वोटर लिस्ट की पारदर्शिता लोकतंत्र की बुनियाद है और इसमें “ज़रा सी चूक भी भरोसा तोड़ सकती है।”
🔍 कानूनी अहमियत
- सांविधानिक पारदर्शिता: बिना कारण नाम हटाना संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(a) का उल्लंघन हो सकता है।
- जनविश्वास पर असर: अचानक लाखों नाम हटाना या जोड़ना चुनावी निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है।
- प्रक्रियात्मक त्रुटि: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में **सूचना और अपील का अधिकार** दिया जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही चुनाव प्रक्रिया जारी हो, लेकिन यदि मामला **मतदाता अधिकारों से जुड़ा हो**, तो न्यायालय इसमें हस्तक्षेप कर सकता है। अगली सुनवाई में **चुनाव आयोग को विस्तृत रिपोर्ट** प्रस्तुत करनी होगी।
Source: LiveLaw (7 Oct 2025) | Read Full Article
Tags: Supreme Court, Election Commission, Bihar Voter List, ADR, Electoral Roll

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