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30 अगस्त 2025
📰नई दिल्ली
पैसा हरऐब ढक देता है,एक सामाजिक मानसिक विश्लेषण
प्रस्तावना
“पैसा हर ऐब ढक देता है” – यह कहावत समाज की उस कड़वी हकीकत को सामने लाती है, जिसमें धन की ताकत इंसान की गलतियों, कमियों और गुनाहों पर पर्दा डाल देती है। सवाल है: क्या वाकई पैसा इंसान की छवि को इतना मजबूत बना देता है कि उसके दोष नज़र ही न आएं?
1. ऐतिहासिक दृष्टिकोण
- इतिहास गवाह है कि राजाओं और सामंतों की विलासिता अक्सर उनके अत्याचारों को ढक देती थी।
- दरबारों में चाटुकार विद्वान और कलाकार, शासक की गलतियों की बजाय उनकी "उदारता" की कहानियाँ लिखते थे।
- उदाहरण: किसी राजा ने हजारों लोगों पर कर का बोझ डाला, लेकिन एक मंदिर या सराय बनवा दी तो वही उसकी “महानता” कहलायी।
2. सामाजिक संदर्भ
- गरीब की गलती बड़ा अपराध मानी जाती है, वहीं अमीर की बड़ी से बड़ी गलती “चूक” या “मस्ती” कहकर टाल दी जाती है।
- अमीर की बुरी आदतें – शराब, जुआ, झूठ, रिश्वत – समाज में "स्टेटस सिंबल" तक बन जाती हैं।
- वहीं गरीब के लिए वही आदतें “बुराई” और “अपराध” का पर्याय बन जाती हैं।
3. मनोवैज्ञानिक पहलू
- पैसा व्यक्ति को आत्मविश्वास और अधिकार देता है। जब लोग आर्थिक रूप से निर्भर होते हैं तो वे अमीर की गलती पर आँख मूँद लेते हैं।
- समाज में “सफलता = पैसा” की परिभाषा बैठ चुकी है। जब कोई धनी होता है तो लोग उसके व्यक्तित्व को चमकते चाँद की तरह देखने लगते हैं, चाहे उसमें धब्बे कितने भी हों।
4. राजनीति और पैसा
- राजनीति में धन का प्रभाव साफ दिखता है।
- अपराध के आरोपों से घिरे नेता भी चुनाव जीतते हैं क्योंकि उनके पास पैसा और संसाधन होते हैं।
- मीडिया, प्रचार और दान–ये सब उस ऐब पर ग्लॉस पेंट की तरह काम करते हैं।
5. नैतिक प्रश्न
- क्या पैसा सचमुच इंसान को पवित्र बना देता है, या यह केवल समाज की आंखों पर पड़ा पर्दा है?
- असल में पैसा दोषों को खत्म नहीं करता, बस लोगों की नज़रें फेर देता है।
- जब तक समाज की सोच “पैसा ही ताकत है” पर टिकी रहेगी, तब तक ईमानदारी और नैतिकता पीछे छिपी रहेंगी।
निष्कर्ष
“पैसा हर ऐब ढक देता है” – यह वाक्य एक कठोर सच्चाई है, लेकिन स्थायी नहीं। पैसा समय के साथ ताकतवर हो सकता है, पर चरित्र और सच्चाई ही वे हथियार हैं जो अंत में इंसान की असली पहचान बताते हैं।
- अल्पकाल में पैसा दोष छिपा सकता है।
- दीर्घकाल में सच्चाई सामने आ ही जाती है।
👉 असली चुनौती है कि समाज पैसे से ऊपर इंसानियत और नैतिकता को तराजू में तौले। तभी यह कहावत बदल सकेगी:
“पैसा ऐब नहीं ढकता, बल्कि इंसानियत उसे उजागर करती है।”
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