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हम खबरों में से खबरें निकालते हैं बाल की खाल की तरह, New Delhi Rizwan
🔥 सीरीज़ मोब लिंचिंग: लोकतंत्र के सीने पर वार
भारत की ज़मीन पर मोब लिंचिंग कोई नई घटना नहीं, लेकिन अख़लाक (दादरी, 2015) की निर्मम हत्या ने इसे राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया।
गाय, गोमांस और धर्म के नाम पर भीड़ ने इंसानों को ऐसे कुचला जैसे इंसान नहीं बल्कि कोई शिकार हो।
अख़लाक की हत्या के बाद मानो एक सिलसिला शुरू हुआ। कहीं रकबर खान (अलवर) को पीटा गया, कहीं पेहेलू खान को दिनदहाड़े लाठियों से मारा गया। कभी झारखंड में तबरेज़ अंसारी को "जय श्री राम" के नारे लगवाकर पीट-पीटकर मार डाला गया।
हर घटना ने सिर्फ एक परिवार का चिराग नहीं बुझाया, बल्कि देश की इंसानियत पर कालिख पोती।
👉 मकसद क्या था?
हर लिंचिंग के पीछे महज़ गाय या गोमांस का मुद्दा नहीं।
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कहीं स्थानीय रंजिशें थीं,
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कहीं सियासी माहौल ने भीड़ को उकसाया,
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कहीं सोशल मीडिया अफ़वाहों ने ज़हर घोला,
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और कई बार मंदिरों के लाउडस्पीकर या नेताओं के बयानों ने आग में घी का काम किया।
⚖️ सवाल यही है:
क्या ये सब आकस्मिक भीड़ थी? या इसके पीछे एक सुनियोजित खेल था?
क्यों हर बार पीड़ित मुसलमान ही निकला?
क्या वजह है कि न्याय व्यवस्था इन मामलों में या तो देर करती है या फिर दोषियों को बचाने का खेल खेला जाता है?
यह पड़ताल सिर्फ घटनाओं की लिस्ट नहीं होगी।
यह एक जांच-पड़ताल होगी कि आखिर क्यों मुसलमानों पर ज़ुल्म और उनके खिलाफ झूठे आरोप — भाजपा की राजनीति और मीडिया की TRP का ईंधन बन गए हैं।
To Be Continue.....

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